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Patanjali Yoga Sutras YOGA DARSHAN

विविध भारतीय दर्शनों के बीच योग दर्शन का स्थान अत्यन्त महत्वपूर्ण है। योग का स्वरूप अत्यन्त व्यापक है परन्तु इसकी मौलिक अवधारणा दार्शनिक एवं आध्यात्मिक है। ऐतिहासिक दृष्टि से योग विज्ञान का विकास कई खण्डों में हुआ है, जो प्राचीन उपनिषदों, श्रीमद्भगवद्गीता तथा पातंजलि योगसूत्रों में निहित योग के आधारभूत ज्ञान से लेकर तदनन्तर कालीन हिन्दू, जैन, बौद्ध, सूफी तथा सिक्ख आदि धर्मों के दार्षनिक विचारों के माध्यम से विविध रूप में विकसित होता हुआ योग का ज्ञान आधुनिक काल में स्वामी विवेकानंद, श्री अरविंद, महात्मा गांधी आदि विचारकों के प्रयास के स्वरूप में दिखाई देता है। वस्तुतः योग भारतीय दर्शन का सार है।

यह एक सुविदित तथ्य है कि भारतीय दर्शन का चरम लक्ष्य प्राणियों को त्रिविध दुःखों से सदा के लिये छुटकारा दिलाना ही है। दुःखों की यह आत्यंतिक निवृत्ति, मुक्ति, मोक्ष, कैवल्य, अपवर्ग, निःश्रेयस्, निर्वाण और परमपद इत्यादि पदों से अभिहित की गई है। इसकी सिद्धि के लिये प्रायः हम सभी भारतीय दर्शन (चार्वाक और मीमांसा के अतिरिक्त) पदार्थों के शुद्ध ज्ञान को किसी न किसी प्रकार से अपरिहार्य उपाय मानते हैं श्रुतियों ने भी ‘ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः’ का तथ्य स्वीकृत किया। पदार्थ के इस शुद्ध ज्ञान को विभिन्न दर्शनों में तत्वज्ञान, सम्यक् ज्ञान, तत्व साक्षात्कार, परम ज्ञान, आत्मज्ञान और विवेक ख्याति इत्यादि नाम से दिये गये हैं। इस शुद्ध ज्ञान का एक रूप तो वह है जो बुद्धि की षुद्ध सात्विक वृत्ति के द्वारा प्राप्त किया जाता है तथा दूसरा तथा उत्तम रूप वह है, जो वृत्तिहीन स्थिति में आत्मा का अपरोक्ष अनुभव होता है। इनमें से प्रथम प्रकार का तत्वज्ञान सांख्य योग में ‘विवेक ख्याति’ के नाम से प्रसिद्ध है और द्वितीय प्रकार का तत्व दर्शन योग शास्त्र में ‘असम्प्रज्ञात योग’ के नाम से विख्यात है। दोनों प्रकार के शुद्धज्ञान को प्राप्त करने की प्रक्रिया बड़ी जटिल है। इस उभयस्तरीय प्रक्रिया का रचनात्मक स्वरूप ही पतंजली योग दर्शन में वर्णित है।

योग दर्शन, साधकों के लिये परम उपयोगी शास्त्र है , इनमें अन्य दर्शनों में खण्डन- मण्डन के बिना बहुत सरलतापूर्वक कम शब्दों में योग के सिद्धान्त का निरूपण किया गया है। इस ग्रंथ पर अब तक संस्कृत एवं हिन्दी और अलग- अलग भाषाओं में भाष्य और टिकाएँ लिखी जा चुकी है। भोज वृत्ति और व्यास के अनुवाद भी हिन्दी भाषा में कई स्थानों से प्रकाशित हो चुके है। इसके अतिरिक्त ‘पातंजल योग प्रदीप’ नामक ग्रंथ के स्वामी ओमानन्द का लिखा हुआ भी प्रकाशित हो चुका है, इसमें व्यास भाष्य एवं भोज वृत्ति के अतिरिक्त अन्य योग विषयक शास्त्रों के भी बहुत से प्रमाण संग्रह करके एवं उपनिषद् एवं श्रीमद्भगवद्गीता आदि सद्ग्रंथों तथा दूसरे दर्शनों के साथ भी समन्वय करके गं्रथों को बहुत उपयोगी बनाया गया है।

योग भाष्यकार व्यास –  योगशास्त्र के इतिहास में पतंजलि के पश्चात् जिस कृति का नाम सर्वाधिक प्रसिद्ध है, वह है व्यास द्वारा रचित व्यास भाष्य। अध्येताओं की दृष्टि में योगसूत्र की भांति योगभाष्य भी अतीव महत्वपूर्ण एवं प्रामाणिक कृति है। योग दर्शन का शास्त्रीय तथा व्यावहारिक उभयविध स्वरूप- निरूपण योगभाष्य के आधार पर किया जाता है। इस भाष्य की प्रसिद्धि ‘योग भाष्य’ , ‘पातंजल भाष्य’ और ‘सांख्य प्रवचन भाष्य’ आदि नामों से है।


योग सूत्र का परिचय -इसमें चार पाद हैं –

1. समाधिपाद,  2. साधनपाद,  3. विभूतिपाद,  4. कैवल्यपाद । इन सभी का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है –

1.समाधिपाद

पहले पाद में योग के लक्षण, स्वरूप और उसकी प्राप्ति के उपायों का वर्णन करते हुए चित्त की वृत्तियों के पांच भेद और उनके लक्षण बताये हैं। वहां सूत्रकार ने निद्रा को भी वृत्ति विषेष के अंतर्गत माना है। (योगसूत्र 1/10) तथा विपर्यय वृत्ति का लक्षण करते समय उसे मिथ्या ज्ञान बताया गया है। अतः साधारण तौर पर यही समझ में आता है कि दूसरे पाद में ‘अवि़द्या’ के नाम से जिस प्रधान क्लेश का वर्णन किया गया है। (योगसूत्र 2/4), वह, और चित्त की विपर्यय वृत्ति दोनों एक ही है। परन्तु गंभीरता पूर्वक विचार करने पर यह बात ठीक नहीं मालूम होती है। द्रष्टा व दर्शन की एकतारूप अस्मिता क्लेश के कारण का नाम ‘अविद्या’ है।

प्रधानतया योग के तीन भेद माने गये हैं- एक सविकल्प दूसरा निर्विकल्प , तीसरा निर्बीज। इस पाद में निर्बीज समाधि का उपाय प्रधानतया पर वैराग्य को बताकर (योगसूत्र 1/18) उसके बाद दूसरा सरल उपाय ईश्वर की शरणागति को बतलाया है। (योगसूत्र 2/23), श्रद्धालु आस्तिक साधकों के लिये यह बड़ा ही उपयोगी है।

उपर्युक्त तीन भेदों में से सम्प्रज्ञात योग के दो भेद हैं उनमें से जो सविकल्प योग है वह तो पूर्वावस्था है, उसमें विवेक ज्ञान नहीं होता। दूसरा जो निर्विकल्प योग है, जिसे निर्विचार समाधि भी कहते हैं वह जब निर्मल हो जाता है। (1/47) उस समय उसमें विवेक ज्ञान प्रकट होता है। वह विवेक ज्ञान पुरुष ख्याति तक हो जाता है। (योगसूत्र 2/28, 3/35) जो कि परवैराग्य का हेतु है। (योगसूत्र 1/16) क्येांकि प्रकृति और पुरुष के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान होने के साथ ही साधक की समस्त गुणों में और उनके कार्यों में आसक्ति का सर्वथा अभाव हो जाता है। तब चित्त में कोई वृत्ति नहीं रहती, यह सब सर्ववृत्ति निरोध रूप निर्बीज समाधि है। (1/51) इसी को असम्प्रज्ञात तथा धर्ममेघ समाधि (योगसूत्र 4/29) भी कहते हैं। इसकी विस्तृत व्याख्या की गई है। निर्बीज समाधि ही योग का अंतिम लक्ष्य है। इसी से आत्मा की स्वरूप प्रतिष्ठा या यों कहें कि कैवल्य स्थिति होती है। (योग सूत्र 4/34)।

समाधिपाद में वर्णित विषय एवं सूत्र संख्या निम्न प्रकार से है –

  • ग्रंथ के आरंभ की प्रतिज्ञा, योग के लक्षण और उसकी आवष्यकता का प्रतिपादन 1- 4
  • चित्त की वृत्तियों के पांच भेद एवं उसके लक्षण 5- 11
  • अभ्यास और वैराग्य का प्रकरण        12-16
  • समाधि का विषय                                    17-22
  • ईश्वर प्रणिधान एवं उसके फल का कथन          23-29
  • चित्त के विक्षपों, उनके नाश का और मन की स्थिति के लिये भिन्न- भिन्न उपायों का वर्णन  /    30-40
  • समाधि के फल सहित अवान्तर भेदों का वर्णन 41-51
  • 2.साधनपाद 
  • इस दूसरे पाद में अविद्यादि पांच क्लेषों को समस्त दुःखों का कारण बताया गया है क्योंकि इनके रहते हुए मनुष्य जो कुछ कर्म करता है वे संस्कार रूप में अंतःकरण में इकट्ठे होते रहते हैं। उन संस्कारों के समुदाय नाम ही कर्माषय है। इस कर्माषय के कारण भूत- क्लेश जब तक रहते हैं तब तक जीव को उनका फल भोगने के लिये कई प्रकार की योनियों में बार- बार जन्मना और मरना पड़ता है एवं पाप कर्म भोगने के लिये घोर नरकों की यातना भी सहन करनी पड़ती है। पुण्य कर्मों फल जो अच्छी योनियों की ओर सुख भोग संबंधी सामग्री की प्राप्ति है, वह भी विवेक की दृष्टि से दुःख ही है। (योगसूत्र 2/15) अतः समस्त दुःखों का सर्वथा अत्यन्त अभाव करने के लिये क्लेषों को मूल से नष्ट करना परमावश्यक है। इस पाद में उनके नाश का उपाय निष्चल और निर्मल विवेक ज्ञान को योगसूत्र 2/26 तथा उस विवेक ज्ञान की प्राप्ति का उपाय योग संबंधी आठ अंगों के अनुष्ठान को योग सूत्र 2/28 में बताया गया है।

    साधन पाद में वर्णित विषय एवं सूत्र संख्या निम्न प्रकार है –

    •       क्रियायोग के स्वरूप और फल का निरूपण    / 1- 2
    •       अविद्यादि पांच क्लेषों का वर्णन                       /  3-9
    •       क्लेषों के नाश का उपाय एवं उसकी आवश्यकता का प्रतिपादन  /10-17
    •       दृष्य और दृष्टा के स्वरूप का तथा दृष्य की सार्थकता का कथन     / 18-22
    •       प्रकृति-पुरुष के अविद्याकृत संयोग का स्वरूप एवं उसके नाश के उपायभूत अविचल विवेकज्ञान का निरूपण  / 23-27
    •       विवेक ज्ञान की प्राप्ति के लिये अष्टांग योग के अनुष्ठान की आवष्यकता, आठों अंगों के नाम तथा उनमें से पांच बाह्य अंगों के लक्षण और उनके विभिन्न अवान्तर फलों का वर्णन   /  28-55
    3.विभूतिपाद
  • इस तीसरे विभूतिपाद में धारणा, ध्यान और समाधि – इन तीनों का एकत्रित नाम ‘संयम’ बतलाकर भिन्न- भिन्न ध्येय पदार्थों में संयम का भिन्न- भिन्न फल बतलाया है। उनको योग का महत्व सिद्धि और विभूति भी कहते है । इस पाद के  3/37, 3/50, 3/51 एवं 4/29 में उनको समाधि में विघ्नरूप बताया है। अतः साधक को भूलकर भी सिद्धियों के प्रलोभन में नहीं पड़ना चाहिए।

    विभूतिपाद में वर्णित विषय एवं सूत्र संख्या निम्न प्रकार से है –

    •       धारणा, ध्यान और समाधि इन तीनों अंगों के स्वरूप प्रतिपादन  / 1-3
    •       निर्बीज समाधि के बहिरंग साधनरूप संयम का निरूपण /  4-8
    •       चित्त के परिणामों का विषय    /9-12
    •       प्रकृति जनित समस्त पदार्थो के परिणाम का निरूपण  /  13-15
    •       फल सहित भिन्न- भिन्न संयमों का वर्णन   / 16-48
    •       विवेक ज्ञान और उसके परम फलस्वरूप कैवल्य का निरूपण /49-55

  • 4.कैवल्यपाद
  • इस चौथे पाद में कैवल्यावस्था प्राप्त करने योग्य चित्त के स्वरूप का प्रतिपादन किया गया है। (यो0सू0 4/26) अंत में धर्ममेघ समाधि का वर्णन करके (योगसूत्र 4/29) उसका फल क्लेश और कर्मों का सर्वथा अभाव (यो0सू0 4/30) तथा गुणों के परिणाम-क्रम  की समाप्ति । अर्थात् पुनर्जन्म का अभाव बताया गया है। (यो0सू0 4/32) एवं पुरुष को मुक्ति प्रदान करके अपना कर्तव्य पूरा कर चुकने के कारण गुणों के कार्य का अपने कारण में विलीन हो जाना अर्थात् पुरुष से सर्वथा अलग हो जाना गुणों की कैवल्य स्थिति और उन गुणों से सर्वथा अलग होकर अपने रूप में प्रतिष्ठित हो जाना ही कैवल्य स्थिति बतलाकर (यो0सू0 4/34) ग्रन्थ की समाप्ति की गई है।

    कैवल्यपाद में वर्णित विषय एवं सूत्र संख्या निम्न प्रकार से है –

    •       सिद्धियों की प्राप्ति के पांच हेतुओं का तथा जात्यन्तर परिणाम का विषय    / 1-5
    •       ध्यानजनित परिणाम की संस्कार शून्यता (निराषयता) का प्रतिपादन एवं योगी के कर्मों की महिमा / 6-7
    •       साधारण मनुष्यों की कर्म फल प्राप्ति के प्रकार का वर्णन /8-11
    •       अपने सिद्धान्त का युक्तिपूर्ण प्रतिपादन /12-24
    •       विवेक ज्ञान का विषय व धर्ममेघ समाधि तथा कैवल्य अवस्था का निरूपण   /25-34

    महर्षि पतंजलि के अनुसार मानवीय प्रकृति (भौतिक तथा आत्मिक) के भिन्न तत्वों के नियंत्रण द्वारा पूर्णता प्राप्ति के लिये किया गया विधिपूर्वक प्रयत्न ही योग है। भौतिक शरीर, सक्रिय इच्छा .शक्तिऔर समझने की .शक्तिरखने वाले मन को नियंत्रण के अंदर लाना आवश्यक है। पतंजलि ने कुछ ऐसे अभ्यासों पर बल दिया है जिनसे .शारीरिक  विकृति की चिकित्सा हो सकती है और शरीर की मलीनता दूर की जा सकती है। जब इन अभ्यासों से हमें अधिक शक्ति, दीर्घकालीन युवावस्था, .शारीरिक स्वस्थता और दीर्घजीवन प्राप्त हो जाय, तो इनका प्रयोग आध्यात्मिक विकास के लिये करना उचित है। इससे मानव जीवन के चरम लक्ष्य कैवल्य या मोक्ष को प्राप्त किया जा सकेगा। चित्त की शुद्ध, शांति एवं एकाग्रता के लिये अन्य विधियों को भी उपयोग में लाया जाता है। पतंजलि का मुख्य लक्ष्य आध्यात्मिक सिद्धान्त का प्रतिपादन नहीं, अपितु क्रियात्मक रूप से यह संकेत करना है कि संयमी जीवन के द्वारा किस प्रकार मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है ।

  • सम्पूर्ण पतंजलि योग सूत्र – 195 सूत्र 

    (महत्वपूर्ण सूत्रों को अवश्य स्मरण करने का प्रयास करे ..)

1.समाधिपाद  – 51 सूत्र

  1. अथ योगानुशासनम्॥१॥
  2. योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः॥२॥
  3. तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्॥३॥
  4. वृत्तिसारूप्यमितरत्र॥४॥
  5. वृत्तयः पञ्चतय्यः क्लिष्टाक्लिष्टाः॥५॥
  6. प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः॥६॥
  7. प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि॥७॥
  8. विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम्॥८॥
  9. शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः॥९॥
  10. अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा॥१०॥
  11. अनुभूतविषयासंप्रमोषः स्मृतिः॥११॥
  12. अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः॥१२॥
  13. तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासः॥१३॥
  14. स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढभूमिः॥१४॥
  15. दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम्॥१५॥
  16. तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम्॥१६॥
  17. वितर्कविचारानन्दास्मितारूपानुगमात् संप्रज्ञातः॥१७॥
  18. विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः संस्कारशेषोऽन्यः॥१८॥
  19. भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम्॥१९॥
  20. श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वक इतरेषाम्॥२०॥
  21. तीव्रसंवेगानामासन्नः॥२१॥
  22. मृदुमध्याधिमात्रत्वात् ततोऽपि विशेषः॥२२॥
  23. ईश्वरप्रणिधानाद्वा॥२३॥
  24. क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः॥२४॥
  25. तत्र निरतिशयं सर्वज्ञबीजम्॥२५॥
  26. पूर्वेषाम् अपि गुरुः कालेनानवच्छेदात्॥२६॥
  27. तस्य वाचकः प्रणवः॥२७॥
  28. तज्जपस्तदर्थभावनम्॥२८॥
  29. ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च॥२९॥
  30. व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्धभूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाः॥३०॥
  31. दुःखदौर्मनस्याङ्गमेजयत्वश्वासप्रश्वासा विक्षेपसहभुवः॥३१॥
  32. तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्त्वाभ्यासः॥३२॥
  33. मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम्॥३३॥
  34. प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य॥३४॥
  35. विषयवती वा प्रवृत्तिरुत्पन्ना मनसः स्थितिनिबन्धिनी॥३५॥
  36. विशोका वा ज्योतिष्मती॥३६॥
  37. वीतरागविषयं वा चित्तम्॥३७॥
  38. स्वप्ननिद्राज्ञानालम्बनं वा॥३८॥
  39. यथाभिमतध्यानाद्व॥३९॥
  40. परमाणु परममहत्त्वान्तोऽस्य वशीकारः॥४०॥
  41. क्षीणवृत्तेरभिजातस्येव मणेर्ग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु तत्स्थतदञ्जनतासमापत्तिः॥४१॥
  42. तत्र शब्दार्थज्ञानविकल्पैः संकीर्णा सवितर्का समापत्तिः॥४२॥
  43. स्मृतिपरिशुद्धौ स्वरूपशून्येवार्थमात्रनिर्भासा निर्वितर्का॥४३॥
  44. एतयैव सविचारा निर्विचारा च सूक्ष्मविषया व्याख्याता॥४४॥
  45. सूक्ष्मविषयत्वं चालिङ्गपर्यवसानम्॥४५॥
  46. ता एव सबीजः समाधिः॥४६॥
  47. निर्विचारवैशारद्येऽध्यात्मप्रसादः॥४७॥
  48. ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा॥४८॥
  49. श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषया विशेषार्थत्वात्॥४९॥
  50. तज्जः संस्कारोऽन्यसंस्कारप्रतिबन्धी॥५०॥
  51. तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीजः समाधिः॥५१॥
  52. 2.साधनपाद -55  सूत्र 
  53. तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः॥१॥
  54. समाधिभावनार्थः क्लेशतनूकरणार्थश्च॥२॥
  55. अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः॥३॥
  56. अविद्याक्षेत्रमुत्तरेषां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम्॥४॥
  57. अनित्याशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या॥५॥
  58. दृग्दर्शनशक्त्योरेकात्मतेवास्मिता॥६॥
  59. सुखानुशयी रागः॥७॥
  60. दुःखानुशयी द्वेषः॥८॥
  61. स्वरसवाही विदुषोऽपि तथारूढो भिनिवेशः॥९॥
  62. ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः॥१०॥
  63. ध्यानहेयास्तद्वृत्तयः॥११॥
  64. क्लेशमूलः कर्माशयो दृष्टादृष्टजन्मवेदनीयः॥१२॥
  65. सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः॥१३॥
  66. ते ह्लादपरितापफलाः पुण्यापुण्यहेतुत्वात्॥१४॥
  67. परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिनः॥१५॥
  68. हेयं दुःखमनागतम्॥१६॥
  69. द्रष्टृदृश्ययोः संयोगो हेयहेतुः॥१७॥
  70. प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थं दृश्यम्॥१८॥
  71. विशेषाविशेषलिङ्गमात्रालिङ्गानि गुणपर्वाणि॥१९॥
  72. द्रष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः॥२०॥
  73. तदर्थ एव दृश्यस्यात्मा॥२१॥
  74. कृतार्थं प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणत्वात्॥२२॥
  75. स्वस्वामिशक्त्योः स्वरूपोपलब्धिहेतुः संयोगः॥२३॥
  76. तस्य हेतुरविद्या॥२४॥
  77. तदभावात् संयोगाभावो हानं तद् दृशेः कैवल्यम्॥२५॥
  78. विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपायः॥२६॥
  79. तस्य सप्तधा प्रान्तभूमिः प्रज्ञा॥२७॥
  80. योगाङ्गाऽनुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः॥२८॥
  81. यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टावङ्गानि॥२९॥
  82. अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः॥३०॥
  83. जातिदेशकालसमयानवच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम्॥३१॥
  84. शौचसंतोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः॥३२॥
  85. वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनम्॥३३॥
  86. वितर्का हिंसादयः कृतकारितानुमोदिता लोभक्रोधमोहपूर्वका मृदुमध्याधिमात्रा दुःखाज्ञानानन्तफला इति प्रतिपक्षभावनम्॥३४॥
  87. अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः॥३५॥
  88. सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम्॥३६॥
  89. अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम्॥३७॥
  90. ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभः॥३८॥
  91. अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथंतासंबोधः॥३९॥
  92. शौचात् स्वाङ्गजुगुप्सा परैरसंसर्गः॥४०॥
  93. सत्त्वशुद्धिसौमनस्यैकाग्र्येन्द्रियजयात्मदर्शनयोग्यत्वानि च॥४१॥
  94. संतोषादनुत्तमसुखलाभः॥४२॥
  95. कायेन्द्रियसिद्धिरशुद्धिक्षयात्तपसः॥४३॥
  96. स्वाध्यायादिष्टदेवतासंप्रयोगः॥४४॥
  97. समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात्॥४५॥
  98. स्थिरसुखमासनम्॥४६॥
  99. प्रयत्नशैथिल्यानन्त्यसमापत्तिभ्याम्॥४७॥
  100. ततो द्वन्द्वानभिघातः॥४८॥
  101. तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः॥४९॥
  102. बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसंख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः॥५०॥
  103. बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः॥५१॥
  104. ततः क्षीयते प्रकाशावरणम्॥५२॥
  105. धारणासु च योग्यता मनसः॥५३॥
  106. स्वविषयासंप्रयोगे चित्तस्य स्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहारः॥५४॥
  107. ततः परमा वश्यतेन्द्रियाणाम्॥५५॥
3. विभूतिपाद -55 सूत्र 

  1. देशबन्धश्चित्तस्य धारणा॥१॥
  2. तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्॥२॥
  3. तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः॥३॥
  4. त्रयमेकत्र संयमः॥४॥
  5. तज्जयात्प्रज्ञालोकः॥५॥
  6. तस्य भूमिषु विनियोगः॥६॥
  7. त्रयमन्तरङ्गं पूर्वेभ्यः॥७॥
  8. तदपि बहिरङ्गं निर्बीजस्य॥८॥
  9. व्युत्थाननिरोधसंस्कारयोरभिभवप्रादुर्भावौ निरोधक्षणचित्तान्वयो निरोधपरिणामः॥९॥
  10. तस्य प्रशान्तवाहिता संस्कारात्॥१०॥
  11. सर्वार्थतैकाग्रतयोः क्षयोदयौ चित्तस्य समाधिपरिणामः॥११॥
  12. ततः पुनः शान्तोदितौ तुल्यप्रत्ययौ चित्तस्यैकाग्रतापरिणामः॥१२॥
  13. एतेन भूतेन्द्रियेषु धर्मलक्षणावस्थापरिणामा व्याख्याताः॥१३॥
  14. शान्तोदिताव्यपदेश्यधर्मानुपाती धर्मी॥१४॥
  15. क्रमान्यत्वं परिणामान्यत्वे हेतुः॥१५॥
  16. परिणामत्रयसंयमासदतीतानागतज्ञानम्॥१६॥
  17. शब्दार्थप्रत्ययानामितरेतराध्यासात् संकरस्तत्प्रविभागसंयमात् सर्वभूतरुतज्ञानम्॥१७॥
  18. संस्कारसाक्षत्करणात् पूर्वजातिज्ञानम्॥१८॥
  19. प्रत्ययस्य परचित्तज्ञानम्॥१९॥
  20. न च तत् सालम्बनं तस्याविषयीभूतत्वात्॥२०॥
  21. कायरूपसंयमात् तद्ग्राह्यशक्तिस्तम्भे चक्षुःप्रकाशासंप्रयोगेऽन्तर्धानम्॥२१॥
  22. सोपक्रमं निरुपक्रमं च कर्म तत्संयमादपरान्तज्ञानमरिष्टेभ्यो वा॥२२॥
  23. मैत्र्यादिषु बलानि॥२३॥
  24. बलेषु हस्तिबलादीनि॥२४॥
  25. प्रवृत्त्यालोकन्यासात् सूक्ष्मव्यवहितविप्रकृष्टज्ञानम्॥२५॥
  26. भुवनज्ञानं सूर्ये संयमात्॥२६॥
  27. चन्द्रे ताराव्यूहज्ञानम्॥२७॥
  28. ध्रुवे तद्गतिज्ञानम्॥२८॥
  29. नाभिचक्रे कायव्यूहज्ञानम्॥२९॥
  30. कण्ठकूपे क्षुत्पिपासानिवृत्तिः॥३०॥
  31. कूर्मनाड्यां स्थैर्यम्॥३१॥
  32. मूर्धज्योतिषि सिद्धदर्शनम्॥३२॥
  33. प्रातिभाद्वा सर्वम्॥३३॥
  34. हृदये चित्तसंवित्॥३४॥
  35. सत्त्वपुरुषयोरत्यन्तासंकीर्णयोः प्रत्ययाविशेषो भोगः परार्थान्यस्वार्थसंयमात् पुरुषज्ञानम्॥३५॥
  36. ततः प्रातिभश्रावणवेदनादर्शास्वादवार्ता जायन्ते॥३६॥
  37. ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः॥३७॥
  38. बन्धकारणशैथिल्यात्प्रचारसंवेदनाच्च चित्तस्य परशरीरावेशः॥३८॥
  39. उदानजयाज्जलपङ्ककण्टकादिष्वसङ्ग उत्क्रान्तिश्च॥३९॥
  40. समानजयाज्ज्वलनम्॥४०॥
  41. श्रोत्राकाशयोः संबन्धसंयमाद्दिव्यं श्रोत्रम्॥४१॥
  42. कायाकाशयोः संबन्धसंयमाल्लघुतूलसमापत्तेश्चाकाशगमनम्॥४२॥
  43. बहिरकल्पिता वृत्तिर्महाविदेहा ततः प्रकाशावरणक्षयः॥४३॥
  44. स्थूलस्वरूपसूक्ष्मान्वयार्थवत्त्वसंयमाद भूतजयः॥४४॥
  45. ततोऽणिमादिप्रादुर्भावः कायसंपत्तद्धर्मानभिघातश्च॥४५॥
  46. रूपलावण्यबलवज्रसंहननत्वानि कायसंपत्॥४६॥
  47. ग्रहणस्वरूपास्मितान्वयार्थवत्त्वसंयमादिन्द्रियजयः॥४७॥
  48. ततो मनोजवित्वं विकरणभावः प्रधानजयश्च॥४८॥
  49. सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रस्य सर्वभावाधिष्ठातृत्वं सर्वज्ञातृत्वं च॥४९॥
  50. तद्वैराग्यादपि दोषबीजक्षये कैवल्यम्॥५०॥
  51. स्थान्युपनिमन्त्रणे सङ्गस्मयाकरणं पुनरनिष्टप्रसङ्गात्॥५१॥
  52. क्षणतत्क्रमयोः संयमाद्विवेकजं ज्ञानम्॥५२॥
  53. जातिलक्षणदेशैरन्यतानवच्छेदात् तुल्ययोस्ततः प्रतिपत्तिः॥५३॥
  54. तारकं सर्वविषयं सर्वथाविषयमक्रमं चेति विवेकजं ज्ञानम्॥५४॥
  55. सत्त्वपुरुषयोः शुद्धिसाम्ये कैवल्यमिति॥५५॥

4.कैवल्यपाद – 34 सूत्र 

  1. जन्मौषधिमन्त्रतपःसमाधिजाःसिद्धयः॥१॥
  2. जात्यन्तरपरिणामः प्रकृत्यापूरात्॥२॥
  3. निमित्तमप्रयोजकं प्रकृतीनां वरणभेदस्तु ततः क्षेत्रिकवत्॥३॥
  4. निर्माणचित्तान्यस्मितामात्रात्॥४॥
  5. प्रवृत्तिभेदे प्रयोजकं चित्तमेकमनेकेषाम्॥५॥
  6. तत्र ध्यानजमनाशयम्॥६॥
  7. कर्माशुक्लाकृष्णं योगिनस्त्रिविधमितरेषाम्॥७॥
  8. ततस्तद्विपाकानुगुणानामेवाभिव्यक्तिर्वासनानाम्॥८॥
  9. जातिदेशकालव्यवहितानामप्यानन्तर्यं स्मृतिसंस्कारयोरेकरूपत्वात्॥९॥
  10. तासामनादित्वं चाशिषो नित्यत्वात्॥१०॥
  11. हेतुफलाश्रयालम्बनैः संगृहीतत्वादेषामभावे तदभावः॥११॥
  12. अतीतानागतं स्वरूपतोऽस्त्यध्वभेदाद्धर्माणाम्॥१२॥
  13. ते व्यक्तसूक्ष्मा गुणात्मानः॥१३॥
  14. परिणामैकत्वाद्व्स्तुतत्त्वम्॥१४॥
  15. वस्तुसाम्ये चित्तभेदात्तयोर्विभक्तः पन्थाः॥१५॥
  16. न चैकचित्ततन्त्रं वस्तु तदप्रमाणकं तदा किं स्यात्॥१६॥
  17. तदुपरागापेक्षत्वाच्चित्तस्य वस्तु ज्ञाताज्ञातम्॥१७॥
  18. सदा ज्ञाताश्चित्तवृत्तयस्तत्प्रभोः पुरुषस्यापरिणामित्वात्॥१८॥
  19. न तत्स्वाभासं दृश्यत्वात्॥१९॥
  20. एकसमये चोभयानवधारणम्॥२०॥
  21. चित्तान्तरदृश्ये बुद्धिबुद्धेरतिप्रसङ्गः स्मृतिसंकरश्च॥२१॥
  22. चितेरप्रतिसंक्रमायास्तदाकारापत्तौ स्वबुद्धिसंवेदनम्॥२२॥
  23. द्रष्टृदृश्योपरक्तं चित्तं सर्वार्थम्॥२३॥
  24. तदसंख्येयवासनाभिश्र्चित्रमपि परार्थं संहत्यकारित्वात्॥२४॥
  25. विशेषदर्शिन आत्मभावभावनाविनिवृत्तिः॥२५॥
  26. तदा विवेकनिम्नं कैवल्यप्राग्भारं चित्तम्॥२६॥
  27. तच्छिद्रेषु प्रत्ययान्तराणि संस्कारेभ्यः॥२७॥
  28. हानमेषां क्लेशवदुक्तम्॥२८॥
  29. प्रसंख्यानेऽप्यकुसीदस्य सर्वथा विवेकख्यातेर्धर्ममेघः समाधिः॥२९॥
  30. ततः क्लेशकर्मनिवृत्तिः॥३०॥
  31. तदा सर्वावरणमलापेतस्य ज्ञानस्यानन्त्याज्ज्ञेयमल्पम्॥३१॥
  32. ततः कृतार्थानां परिणामक्रमसमाप्तिर्गुणानाम्॥३२॥
  33. क्षणप्रतियोगी परिणामापरान्तनिग्रार्ह्यः क्रमः॥३३॥
  34. पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिरिति॥३४॥


अथ योगानुशासनम्॥१॥

सूत्र :अथ योगानुशासनम् ॥॥1/1
सूत्र संख्या :1

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पदच्छे - अथ। योगानुशासनम्। पदार्थ- (अर्थ) अब (योगानुशासनम्) योगशास्त्र का प्रारम्भ किया जाता है।।

व्याख्या :
भाष्य - सूत्र में “अथ” शब्द का अधिकार का वाचक है, अधिकार, प्रस्ताव, प्रारम्भ, यही एक ही अर्थ के बोधक हैं, समाधिक अर्थ में होने वाली “युज्” धातु से योग शब्द सिद्ध होता है जिसके अर्थ यहां समाधिक के हैं और “अनुशिष्यतेऽनेनेत्यनुशासनम्”=जिससे लक्षण, भेद, उपाय, प्रयोजन आदि प्रतिपादन किये जायं उसको “अनुशासन” कहते हैं।। भाव यह है कि योग के लक्षणादि को विस्तारपूर्वक प्रतिपादन करनेवाले योगशास्त्र का प्रारम्भ करते हैं।। सं०-अब योग का लक्षण कहते हैं-


सूत्र :योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ॥॥1/2
सूत्र संख्या :2

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पद०- योगः। चित्तवृत्तिनिरोधः। पदा०- (चित्तवृत्तिनिरोधः) चित्तवृत्ति के निरोध को (योगः) योग कहते हैं।।

व्याख्या :
अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ।। कठ० ६। ११ है जिसमें वह चेष्टा नहीं करती, उस समय पुरूष स्वरूप में स्थित होने के कारण क्केश आदि प्रमाद से रहित होता है, क्योंकि ईश्वरीय गुणों के प्रकाश और क्केशादिकों के नाश का नाम योग है और यह योग जिसका इस औपनिषद दर्शन में वर्णन किया है इसी को भगवान् पतंजलि इस सूत्र में निरूपण करते हैं, चित्त शब्द के अर्थ यहां अन्तःकरण के हैं और वह सत्त्व, रज, तम, इन तीन गुणों की साम्यावस्थारूप प्रकृति का परिणाम=कार्य्य होने से त्रिगुणात्मक है, इसी को मन और बुद्धि भी कहते हैं और इसी के घटपटादि वाहृा पदार्थ तथा काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि आभ्यन्तर पदार्थों को विषय करनेवाले परिणाम-विशेष को वृत्ति कहते है, यह त्रिगुणात्मक अन्तःकरण का परिणाम होने के कारण शान्त, घोर, मूढ, इस भेद से तीन प्रकार की है- सात्त्विकवृत्ति का नाम शान्त, राजसवृत्ति का नाम घोर तथा तामसवृत्ति का नाम मूढऋ है, यह वृत्तियें प्रमाण आदि भेद से कई प्रकार की हैं ओर इन्हीं के निरोध को योग कहते हैं, यह निरोध अभ्यास, वैराग्य आदि साधनों के अनुष्ठान से होता है जिसका १२ वें सूत्र में विस्तारपूर्वक निरूपण किया जायगा।। तात्पर्य यह है कि अभ्यास, वैराग्य आदि साधनों के अनुष्ठान से क्केश कर्माद्किों की निवृत्ति हो हेतु शान्त, घोर, मूढ़, प्रमाण आदि निखिलवृत्तियों के निरोधरूप चित्त की अवस्था विशेष का नाम “योग” है।। क्षेप, मौढय, विक्षेप, एकाय्य, निरोध इस भेद् से चित्त की पांच अवस्था हैं, रजोगुण की अधिकता से सांसारिक विषयों में आसक्त चित्त की अत्यन्त चाश्वल्य अवस्था का नाम “क्षेप” है, इस अवस्था वाला चित्त क्षिप्त कहलाता है, तमोगुण की अधिकता से कत्र्तव्याकत्र्तव्य के विवेक से शून्य चित्त की निद्रा, तन्द्रा, आलस्य आदि अवस्था विशेष का नाम “मौढय” है, इस अवस्था वाला चित्त मूढ़ कहलाता है, सत्त्व गुण की प्रधानता से सांसारिक विषयों से उपराम हुए चित्त की कदाचित् होनेवाली एकाय्य अवस्था का नाम “विक्षेप” है, इस अवस्था वाला चित्त विक्षिप्त कहलाता है, रजोगुण, तमोगुण के सम्बन्ध से रहिते शुद्धसत्त्वंगुण प्रधान चित्त की ईश्वर में एकतान्तारूप अवस्थाविशेष का नाम “एकाय्य” है अर्थात् जिस अवस्था में अभ्यास वैराग्य आदि साधनों के अनुष्ठान से प्रमाण राजस तामस वृत्तियों के निरोध होजाने पर अपनी आत्मा तथा परमात्मा में ही चित्त की स्थिरता होती है उस अवस्था का नाम “एकाय्य” है, इस अवस्था वाला चित्त एकाग्र कहलाता है, जिस अवस्था में आत्मा तथा परमात्मा को विषय करने वाली सात्तिवकवृत्ति भी नहीं रहती ओर चित्त निरावलम्बन हुआ क्केश कर्मादि वासनाओं के सहित अपने कारण प्रकृति में लीन होजाता है और जीवात्मा अपने चैतनयस्वरूप से परमात्मा के स्वरूपभूत आनन्द का अनुभव करता है उस अवस्था विशेष का नाम “निरोध” है, इस अवस्थावाला चित्त निरूद्ध कहलाता है।। इनमें तीसरी अवस्था वाले चित्त का योग में अधिकार है, प्रथम तथा दूसरी अवस्था-वाले का नहीं और अन्त की दोनों अवस्था वाला वित्तयोगी का ही होता है अन्य का नहीं।। सं०-जिस अवस्था में वृत्तियों का निरोध होजाता है उस अवस्था में जीवात्मा की स्थिति कहां होती है? उत्तरः

सूत्र :तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् ॥॥1/3
सूत्र संख्या :3

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पद०-तदा। द्रष्टुः । स्वरूपे। अवस्थानम्। पदा०-(तदा) उस अवस्था में (द्रष्टुः, स्वरूपे) परमात्मा के स्वरूप में (अवस्थानम्) स्थिति होती है।।

व्याख्या :
भाष्य- जब सर्ववृत्तियों का निरोध होकर चित्त अपने कारण प्रकृति में लीन होजाता है तब इस जीवात्मा का प्रकृति तथा प्राकृत पदार्थों के साथ सम्बन्ध नहीं रहता, उस अवस्था में वह अपने चेतन स्वरूप से परमात्मा के आनन्द को भोगता हुआ उसी में स्थिर होता है, क्योंकि परमात्मा ही सब जीवों का आश्रण् है।। इसी भाव को महर्षि कपित सांख्यशास्त्र में इस प्रकार वर्णन करते हैं कि “समाधिसुपुप्तिमोक्षेपु ब्रहारूपता” सां० ५। ११६ =समाधि, सुषुप्ति और मोक्ष में पुरूष की ब्रहा के समान रूपता अर्थात् उसके स्वरूप में स्थिति होती है और इसी अर्थ को “स्वरूपप्रतिष्ठा तदानी चितिशक्तिर्यथाकैवल्ये” इस व्यासभाष्य में इस प्रकार स्पष्ट किया है कि कैवल्य=मुक्ति में प्रकृति तथा प्राकृत पदार्थों के सम्बन्ध से मुक्त हुअस चेतनशक्ति पुरूष परमात्मा के स्वरूप में स्थिप होता है, इसी प्रकार चित्तवृत्तिनिरोध काल में इसकी परमात्मा में स्थिति होती है।। और जो आधुनिक टीकाकार इस सूत्र में “द्रष्टुः” पद से जीवात्मा को कहीं भी मुख्य द्रष्टा नहीं माना किन्तु युद्धि के सम्बन्ध से द्रष्टा माना है, जैसाकि “द्रष्टद्दशिमात्रः शुद्धोऽपिप्रत्ययानुपश्यः” यो० २। २०=ज्ञानस्वरूप पुरूष अपने स्वरूप में ज्ञान का अनाश्रय होने के कारण शुद्ध अर्थात् अद्रष्टा हुआ भी बुद्धि के सम्बन्ध से द्रष्टा है, तीसरे वेद ओर उपनिषदों में भी मुख्यतया परमात्मा को ही द्रष्टा निरूपण किया है, जैसाकिः- द्वासुपर्णा सयुजा सरवाया समानं वृक्षं परिपस्वजाते। तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्न्नन्योऽभिचाकरीति।। ऋ० २। ३। १७ अर्थ-प्रकृति रूपी वृक्ष पर जीव ओर ईश्वररूपी देा पंक्षी निवास करते हैं जो आपस में चेतन होने के कारण सखा अर्थात् समान धर्मवालने और सेव्य सेवक हैं, उनमें से एक कर्मफल का भोक्ता ओर दूसरा साक्षी अर्थात् द्रष्टा है “नात्योऽतोस्तिद्रष्टा” वृहदा० ३।८। ११ =उस परमात्मा से भिन्न दूसरा कोई द्रष्टा नहीं, और ऐसा मानने से “मुख्यामुख्ययोर्मुख्ये कार्य्यसम्प्रत्ययः”=मुख्य और अमुख्य की प्राप्ति होने पर मुख्य का ग्रहण होता है, यह न्याय भी सड्डत होजाता है, अतएव यहां द्रष्टा पद से ईश्वर ही का ग्रहण होसकता है जीव का नहीं।। सं०-व्युत्थान काल में अर्थात् वृत्तियों के बने रहने पर जीवात्मा की स्थिति कहां पर होती है? उत्तर:-
सूत्र :वृत्ति सारूप्यमितरत्र ॥॥1/4
सूत्र संख्या :4

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पद०-वृत्तिसारूप्यम्। इतरत्र। पदा०- (इतरत्र) व्युत्थानकाल में (वृत्तिसारूप्यम्) वृत्ति के समान होता है।।

व्याख्या :
भाष्य- जिसकाले में चित्त एकाग्र वा निरूद्ध नहीं किन्तु व्युत्थान को प्राप्त है उस काल में तप्तलोहपिण्ड की भांति का तादात्म्य सम्बन्ध बने रहने से चक्षुरादि के द्वारा वाहृा विषय तथा आभ्यन्तर विषयों मे जिस २ विषय के आकार वाली शांत, घोर तथा मूढ़ चित्त की वृत्तियें उद्य होती हैं उस समय विवेकाग्रह न होने के कारण मै शान्त हूं, मैं घोर हूं, मै मूढ् हूं, इस प्रकार पुरूष उनको अपने में आरोप करलेता है अर्थात् बुद्धिवृत्तियों के समान आकार को धारण किये हुए प्रतीत होता है, जैसाकि “कतम आत्मेति योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हद्यन्तज्र्योतिः पुरूषःस समानः सन्नुभौ लोकावनुसंचरति ध्यायतीव लेलायतीव” वृहदा० ४ । ३ । ७ =राजा जनक ने याज्ञवल्क्य से पूछा कि इस शरीररूप संघात में आत्मा कौन है? याज्वल्क्य ने उत्तर दिया कि हे राजन्! जो बुद्धि के साथ मिला हुआ प्राणद्सिंघात का स्वामी हृदयदेश में स्वयंज्योति पुरूष है वही आत्मा है और वह बुद्धि आदि के सहारे इस लोक तथा परलोक में गमन करता है और जिस २ प्रकार बुद्धि की वृत्तिये उद्य होती हैं वह भी उन्हीं के समान भासता है अर्थात् पुरूष व्युत्थान काल में बुद्धिवृत्ति के समान वृत्तिवाला होता है।। यहां यह भी जानना आवश्यक है कि बुद्धि की भांति पुरूष की कोई वृत्ति नहीं है, केवल बुद्धि के समीप होने से पुरूष का उसमें प्रतिबिम्ब पड़ता है और प्रतिविम्बित पुरूष में बुद्धिवृत्तियों की छाया पड़ने से पुरूष अविवेक के कारण उनको अपने स्वरूप में आरोप कर अपनी वृत्ति मान लेता है, इसी आशय से भाष्यकार ने कहा है कि “व्युत्थाने याश्रित्तवृत्तयस्तदविशिष्टवृत्तिःपुरूष”=व्युत्थान काल में जैसी २ बुद्धि की वृत्ति होती है उसी के इसी अर्थ को इस प्रकार स्फुट किया है कि “एकमेवदर्शनं ख्यातिरेवदर्शनम्”=व्युत्थान काल में बुद्धिवृत्तिरूप एकही ज्ञान होता है, या यों कहो कि व्युत्थान काल में बुद्धि के समान ही पुरूष का रूप होता है।। सं०-जिन वृत्तियों के निरोध का नाम योग है वह कितने प्रकार की है? उत्तर:-

सूत्र :वृत्तयः पञ्चतय्यः क्लिष्टाक्लिष्टाः ॥॥1/5
सूत्र संख्या :5

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पद० - वृत्तयः। पशतय्यः। क्किष्टाक्किष्टाः। पदा०- (वृत्तयः) निरोध करने योग्य, चित्तवृत्तियें (पशचय्यः) पांच प्रकार की हैं और फिर वह (क्किष्टाक्किष्टाः) क्किष्ट, अक्किष्ट भेद से दो प्रकार हैं।।

व्याख्या :
भाष्य-धर्माधर्म की वासना को उत्पन्न करनेवाली राजस, तामस वृत्तियों को “क्किष्ट” कहते है अर्थात् जिन वृत्तियों के उदय होने से पुरूष रागद्वेषादि में प्रवत्त हुआ शुभाशुभ कर्मों के करने से पुनः २ जन्ममरणरूप कष्ट को प्राप्त होता है उनको क्किष्ट कहते हैं और जो वृत्तियें प्रकृति पुरूष के विवेक अर्थात् भेद को विषय करती हुई गुणाधिकार + को निवृत्त करती हैं ऐसी सात्त्विक वृत्तियों का नाम अक्किष्ट है।। तात्पर्य यह है कि जिन वृत्तियों के उदय होने से पुरूष के भावी जन्म का आरम्भ होता है उनको क्किष्ट और जिनके उद्य होने से मनुष्य के भावी जम्न का आरम्भ नहीं होता अर्थात् जिनसे पुरूष मुक्तवस्था को प्राप्त हो जाता है उनको अक्किष्ट कहते है इस प्रकार क्किष्टाक्किष्टं भेद्वाली निरोध के योग्य चित्त की वृत्तियें पांच प्रकार की हैं।। यहां यह भी जानना आवश्यक हैं कि यद्यपिं लज्जा, तृष्णा आदि भेद से चित्तवृत्त्यिें असंख्यात है, जिनकी गणना सहस्त्रों वर्ष पर्य्यन्त भी होनी असम्भव है तथापि वह सब निरोध के योग्य नहीं, क्योंकि उनका पांच प्रकार की वृत्तियों में अन्तर्भाव होने के कारण्या इनके निरोध से स्वयं निरोध हो जाता हैं, इसीलिये निरोध करने योग्य केवल पांच ही वृत्तियें है।। सं०-अब पांच वृत्तियां को कहते हैं:-

सूत्र :प्रमाण विपर्यय विकल्प निद्रा स्मृतयः ॥॥1/6
सूत्र संख्या :6

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पद०-एकपद्०। पदा० - (प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः) प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा, स्मृति, यह पांच वृत्तियें है।। सं० - अब प्रमाणवृत्ति का लक्षण करते हुए उसका विभाग कथन करते हैं:-

सूत्र :प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि ॥॥1/7
सूत्र संख्या :7

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पद०- प्रत्यक्षानुमानागमाः । प्रमाणानि । पदा० - (प्रत्यक्षानुमानागमाः) प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, यह तीन (प्रमाणिन) प्रमाण हैं।।

व्याख्या :
भाष्य - “प्रमीयतेऽर्थोयेन तत्प्रमाणम्”=जिससे विषय का याथर्थ ज्ञान हो उसको “प्रमाणवृत्ति” कहते हैं अर्थात् प्रमा=यथार्य ज्ञान के असाधारण कांरण का नाम “प्रमाणवृत्ति” है।। चक्षु आदि इन्द्रियों के द्वारा उत्पन्न होकर अनधिगत = अज्ञात तथा अंवाधित = सत्य अर्थ को विषय करनेवाली चित्तवृत्ति को “प्रत्यक्ष प्रमाण” कहते हैं अर्थात् चक्षु आदि इन्द्रियों का जब घटपटादि वाहृा पदार्थों के साथ संयोगादि सम्बन्ध होता है तब उनके द्वारा चित्त का भी सम्बध होने से घटोऽयं=यह घट है, पढोऽयं = यह पट है, इस आकारवाली जो चित्त की वृत्ति उत्पन्न होती है उसको प्रत्यक्ष प्रमाण कहते हैं। यहां यह भी जानना आवश्यक है कि प्रतयक्ष प्रमाणवृत्ति के विषय में आचाय्र्यों के दो मत हैं, एक यह कि बुद्धि की वृत्ति चक्षु आदि इन्द्रियों के द्वारा बाहर जाकर घटपटादि अर्थ को ग्रहण करती हुई पुरूष को दिखाती है, दूसरा यह कि वाहृां विषय प्रथम चक्षु आदि इन्द्रियों में प्रतिबिम्बत होकर पश्चात् बुद्धि में प्रतिबिम्बित होते हैं और बुद्धि में ही उत्पन्न हुई तदाकार वृत्ति सम्पूर्ण विषय पुरूष को दिखाती है, इनमें प्रथमपक्ष प्राचीनों और द्वितीय-पक्ष नवीनों का है, परन्तु वैदिकसिद्धान्त में उक्त दोनों पक्ष माननीय हैं। लिड्ढपरामर्श ’ द्वारा उत्पन्न होकर अनाधगत तथा क्षवाधित अर्थ को सामान्यरूप में विषय करनेवाली चित्तवृत्ति को “अनुमान” कहते हैं अर्थात् जो वस्तु चक्षु आदि इन्द्रियों के द्वारा उत्पन्न हुई चित्तवृत्ति से नहीं जानी गई किन्तु हेतु ज्ञान के अनन्तर उत्पन्न हुई चित्तवृत्ति के द्वारा सामान्यरूप से जानी जाय उसको अनुमान कहते हैं। आप्तपुरूष प्रत्यक्ष अथवा अनुमान से जाने हुए जिस अनधिगत, अवाधित अर्थ का उपदेष जिस शब्द द्वारा करता है उस शब्द से उत्पन्न हो कर अर्थ को विषय करनेवाली चित्तवृत्ति को “शब्द प्रमाण” कहते हैं।। इन तीनों प्रमाणों से जो पुरूष को ज्ञान होता है वह फलप्रमा तथा पौरूपेय बोध कहलाता है अर्थात् प्रत्यक्ष, अनुमान तथा शब्द प्रमाण से पुरूष को “घटहंजानामि”= मैंने घट को जाना, इस आकार वाला जो यथार्थ ज्ञान उत्पन्न होता है उसका नाम पौरूपेयबोध तथा फलप्रमा है, यह संक्षेप से प्रत्यक्षादि प्रमाणों का लक्षण किया गया, इसका विस्तार “सांख्यार्य्यभाष्य” में भलेप्रकार किया है विषेश जाननेवाले वहा देखलें।। सं० - अब विपर्यय का लक्षण करते है:-

सूत्र :विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूप प्रतिष्ठम् ॥॥1/8
सूत्र संख्या :8

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पद० - विपर्ययः। मिथ्याज्ञानं । अतद्रूपप्रतिष्ठम्। पदा०- (अतद्रूपप्रतिष्ठम्) जिसकी वस्तु के यथार्थरूप में स्थिति न हो ऐसे (मिथ्याज्ञानं) मिथ्याज्ञान को (विपर्ययः) विपर्यय कहते हैं।।

व्याख्या :
भाष्य - “अतद्रुपप्रतिष्ठम्” इस पद में असमर्थसमास है, इसलिये यह “तद्रूपाप्रतिष्ठम्” ऐसा समझना चाहिये, जो ज्ञान वस्तु के यथार्थरूप में स्थिर नहीं अर्थात् वस्तु के सत्यरूप को विषय न करने से कालन्तर में उससे च्युत होजाता है जैसाकि रज्जु में सर्पज्ञान, शुक्ति=सीपी में चांदी का ज्ञान तथा एक चन्द्र में द्विचन्द्र ज्ञान है, ऐसे मिथ्या ज्ञान का नाम “विपर्यय” है।। तात्पर्य यह है कि जो वस्तु जिस प्रकार की हो उसको किसी नेत्रदोष, चित्तदोष वा अन्धकार आदि दोष के कारण उसी प्रकार से विषय न करके किसी अन्य प्रकार से विषय करनेवाली चित्तवृत्ति को “विपर्यय” कहते हैं।। यहां यह भी जानना आवश्यक है कि सूत्र में “अतद्रूपाप्रतिष्ठम्” यह पद् संशयवृत्ति के ग्रहणार्थ आया है, क्योंकि वह भी वस्तु के यथार्थ रूप में अप्रतिष्ठित अर्थात् स्थिर न होने के कारण मिथ्या ज्ञाना है, भेद केवल इतना है कि संशय ज्ञान में दो कोटि तथा विपर्यय ज्ञान में एक कोटि का भान होता है और “मिथ्याज्ञानं” यह पद् विकल्पवृत्ति में विपर्ययवृत्ति के लक्षण की अतिव्याप्ति के निराकाणार्थ आया है, क्योंकि विकल्पज्ञान भी वस्तुशुन्य होने से वस्तु के यथार्थरूप में प्रतिष्ठित नहीं होता, परन्तु सर्वसाधारण को उसके वाघ=अयथार्थपन का ज्ञान न होने से वह मिथ्या ज्ञान नहीं।। यहां इतना और भी जानना आवश्यक है कि आहार्य्य और अनाहार्य्य भेद से विपर्यवृत्ति दो प्रकार की है, अपनी इच्छा से उत्पन्न की गई वृत्ति का नाम “आहार्य्य” और स्वतः उत्पन्न होनेवाली वृत्ति का नाम “अनाहार्य्य” है जैसाकि शालिग्राम आदिकों में ईश्वरबुद्धि “आहार्य्य” और शुक्ति आदिकों में रजतादिबुद्धि “अनाहार्य्य” है, यह दोनों प्रकार की विपर्ययवृत्ति अनर्थ का हेतु होने से निरोध करने योग्य हैं, इनमें प्रथम वृत्ति के अनन्त भेद हैं जिनको बुद्धिमान् स्वयं जान सकते हैं और दूसरी वृत्ति के अविद्या आदि पांच भेद हैं जिनका आगे साधनपाद् में विस्तारपूर्वक निरूपण किया जायगा।। सं० - अब विकल्पवृत्ति का लक्षण करते हैं:-

सूत्र :शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः ॥॥1/9
सूत्र संख्या :9

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पद० - शब्दज्ञानानुपाती। वस्तुशून्यः । विकल्पः । पदा० - (शब्दज्ञानानुपाती) शब्दज्ञान के सहात्म्य से होने वाले (वस्तुशून्यः) विषयरहित ज्ञान को (विकल्पः) विकल्प कहते हैं।।

व्याख्या :
भाष्य - जो ज्ञान वस्तु नाम विषय से रहित हो अर्थात् जिस ज्ञान का विषय कुछ न हो और शब्दज्ञान से उत्पन्न होजाय उसको “विकल्प” कहते हैं, यहां शब्दज्ञान से तात्पर्य शब्द को विषय करने वाले सामान्य ज्ञान से है, वह अक्षरों के देखने अथवा शब्द के श्रवण से हो, केवल श्रावणज्ञान ही अपेक्षित नहीं।। भाव यह है कि सत्, असत् विषय के न होने पर भी शब्दज्ञान की सामथ्र्य मात्र से उस २ विषय के आकार को धारण करने वाली “वन्ध्या का पुत्र, आकाश के फूल” इत्यादि प्रकार की चित्तवृत्ति को विकल्प कहते हैं, यह विकल्पवृत्ति निर्विषय होने से प्रमाण नहीं और बुद्धिमानों की दृष्टि में विषय का वाघ होन पर भी व्यवहार का वाघ नहीं होता और संशय तथा विपर्यय वृत्ति में व्यवहार का भी वाघ होजाता है, इसलिये संशय तथा विपर्यय भी नहीं किन्तु प्रमाण तथा संशय विपर्यवृत्ति से भिन्न वृत्ति है।। वार्तिककार के अनुसारी विवरणकार ने इस सूत्र का यह अर्थ किया है कि जो ज्ञान वस्तु=विषय से शून्य हो और शब्दज्ञानानुपाती=प्रमाण ज्ञान की भांति शब्द तथा ज्ञानात्मक व्यवहार का जनक हो उसको “विकल्प” कहते हैं, जिसका तात्पर्य यह है कि जैसे प्रत्यक्ष आदि प्रमाण वृत्तियें अपने २ विषय में शब्द तथा ज्ञानात्मकर व्यवहार की जनक है वैसे ही व्यवहार का जनक हो और उनकी भांति कोई विषय न रखता हो, उसका नाम विकल्प है।। सं० - अब निद्रावृत्ति का लक्षण करते हैं:-

सूत्र :अभावप्रत्ययालम्बना तमोवृत्तिर्निद्र ॥॥1/10
सूत्र संख्या :10

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पद० - अभावप्रत्ययालम्बना । वृत्तिः। निद्रा। पदा०- (अभावप्रत्ययालम्बना) जाग्रत तथा स्वप्र वृत्तियों के अभाव के कारण सत्त्वगुण तथा रजोगुण के आच्छादक तमोगुण को विषय करने वाली (वृत्तिः) वृत्ति का नाम (निद्रा) निद्रा है।।

व्याख्या :
भाष्य- जिसके आविर्भूत होने पर अन्य सर्व वृत्तियें अभाव को प्राप्त हो जाती हैं वह अभावप्रत्यय अर्थात् तमोगुण कहलाता है, उस तमोगुण को विषय करनेवाला जो चित्त का परिणाम उसको “निद्रा” कहते हैं अथवा जाग्रत स्वप्र काल की वृत्तियों के अभाव के कारण को अभावप्रत्यय कहते हैं, यहां आलम्ंबन नाम विषय का है, सूत्रार्थ यह हुआ कि जिस समय बुद्धि में तमोगुण आविर्भूत होकर सत्त्वगुण, रजोगुण तथा वाहृोन्द्रियों को आच्छादन कर लेता है उसक समय वाहृा अर्थो के साथ सम्बन्ध न रहने के कारण उनको विषय करनेवाली सम्पूर्ण वृत्तियों के निवृत्त होजाने से केवल तमोगुण को विषय करने वाली जो चित्तवृत्ति उत्पन्न होती है उसको “निद्रा” कहते हैं।। सं० - अब स्मृतिवृत्ति का लक्षण करते हैं-

सूत्र :अनुभूतविषयासंप्रमोषः स्मृतिः ॥॥1/11
सूत्र संख्या :11

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पद०- अनुभूतविषयासम्प्रमोषः । स्मृतिः। पदा०- (अनुभूतविषयासम्प्रमोषः) पूर्व अनुभव किये हुए विषय के संस्कार से उसी विषय में होनेवाले ज्ञान का नाम (स्मृतिः) स्मृति है।।

व्याख्या :
भाष्य - “सम्प्रमोषः” पद् का अर्थ स्तेय= चोरी है, वह स्तेय अर्थ में वत्र्तने वाले (सम्-प-पूर्वक) मुप् धातु से सिद्ध होता है, पूर्वकाल मे अनुभव किया हुआ विषय स्मृति का स्वार्थ=अपना विषय होता है और जो विषय पूर्व अनुभव नहीं किया वह परार्थ=दूसरे का अर्थ है, एवं सूत्रार्थ यह हुआ कि पूर्व प्रत्यक्षादि प्रमाणों से जितने अर्थ का अनुभव हुआ है उतने ही अर्थ को विषय करने वाली संस्कारजन्य वित्तवृत्ति का नाम “स्मृति” है।। सं०- अब निरोध करने योग्य पांच प्रकार की चित्त्वृत्तियों का कथन करके उनके निरोध का उपाय वर्णन करते हैं-

सूत्र :अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः ॥॥1/12
सूत्र संख्या :12

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पद०- अभ्यासवैराग्याभयां। तन्निरोधः पदा०- (अभ्यासवैराग्याभयां) अभ्यास और वैराग्य से (तन्निरोधः) उन वृत्तियों का निरोध होता है।।

व्याख्या :
भाष्य- अभयास और वैराग्य का लक्षण आगे निरूपण करेंगे, इन दोनों के अनुष्ठान से चित्त की सर्व वृत्तियों का निरोध होजात है, इनमें वैराग्य चित्तवृत्ति के निरोध का ओर अभ्यास निरोध की स्थिरता का उपया है।। तात्पर्य्य यह है कि सम्पूर्ण चित्तवृत्तियों के निरोध करने में दोनों का समुच्चय=मिलाप है विकल्प नहीं अर्थात् यह दोनों मिलकर निरोध को सम्पादन कर सकते हैं पृथक् २ नहीं, यहां पर अनुष्ठानकम की अपेक्षा से सूत्र का “वैराग्यभ्यासाभ्यांतन्निरोध:” ऐसा पाठ होना चाहिये, क्योंकि वैराग्य, के अनन्तर ही अभ्यास होसकता है प्रथम नहीं।। सं०- अब अभ्यास का लक्षण करते हैं:-

सूत्र :तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासः ॥॥1/13
सूत्र संख्या :13

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पद०- तत्र। स्थितौ। यत्र:। अभ्यास:। पदा० - (तत्र) उन दोनों के मध्य में जो (स्थितौ) चित्त की स्थिति के लिये (यत्र:) यत्र किया जाता है उसको (अभ्यास:) कहते हैं।।

व्याख्या :
भाष्य-अपरवैराग्य के अनुष्ठान से राजस, तामस वृत्तियों के निरोध होने पर जो वित्त में एकाग्रता अर्थात् एकमात्र सात्त्विक वृत्तियों का प्रवाह उदय होता है उसको स्थिति कहते हैं, उस स्थिति के लिये इस बहिर्मुख चित्त का “मैं सर्वथा निरोध करूँगा” इस प्रकार मानस उत्साह द्वारा चित्त को वाहृा विषयों से रोककर यम नियमादि साधनों के अनुष्ठान में लगाने का नाम “अभ्यास” है।। सं०-अब उक्त अभ्यास की दृढ़ता का उपाय कथन करते हैं-

सूत्र :स तु दीर्घकाल नैरन्तर्य सत्कारादरासेवितो दृढभूमिः ॥॥1/14
सूत्र संख्या :14

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पद०-सः। तु । दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितः । दृढ़भूमि:। पदा० - (दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवित:) दीर्घकाल, निरन्तर तथा ब्रहृाचर्य्य आदि से अनुष्ठान किया हुआ (सः, तु) अभ्यास (दृढ़भूमि) दृढ़ होता है।।

व्याख्या :
भाष्य - सूत्र में “दीर्घकाल” से तात्पर्य मरणपर्य्यन्त का है और “नैरन्तर्य” पद का अर्थ सुपुप्ति पर्य्यन्त भी त्रुटि का न होना ओर “सत्कार” पद का अर्थ ब्रहाचर्य्य, श्रद्धा आदि हैं।। तात्पर्य्य यह है कि जब पुरूष दीर्घकालपर्य्यन्त निरन्तर ब्रहाचर्य्य आदि का अनुष्ठान करता है तब अभ्यास दृढ़ हो जाता है फिर व्युत्थान के संस्कारों से चलायमान नहीं होता अर्थात् चित्त स्थिर होजाता है, अतएव अभ्यास की छढ़ता के लिये उसका निरन्तर सेवन करना उचित है।। सं०- पर और अपर भेद से वैराग्य दो प्रकार का है इनमें से प्रथम अपर वैराग्य का लक्षण करते हैं:-

सूत्र :दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्णा वैराग्यम् ॥॥1/15
सूत्र संख्या :15

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पद०- दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य । वशीकारसंज्ञावैराग्यम् । पदा०- (दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य) इस लोक तथा परलोक के विषयों की तृष्णा से रहित पुरूष के चित्त की स्थिति को (वशीकारसंज्ञावैराग्यम्) वशीकार नामक अपन वैराग्य कहते हैं।।

व्याख्या :
भाष्य- स्त्री, पुत्र, ऐश्वर्य आदि चेतन, अचेतन इस लोक में होने वाले विषयों को “दृष्टविषय” और परलो से लेकर प्रकृतिलय पर्य्यन्त विषयों को “अनुश्रविक” विषय कहते है, गुरूकृत उच्चारण के अनन्तर सुने जाने से वेद का नाम “अनुश्रव” और वेद से जो विषय जाने जायं उनका नाम “अनुश्रविक” है।। वेद में परलोक तथा प्रकृतिलय आदि विषयों का वर्णन इस प्रकार आया है कि:- द्वेस्त्रुतीअश्रृणवंपितृणामहं देवानामुतमत्र्यानाम्। ताभ्यामिदं विश्वमेजत्समेतियदन्तरापितरं मातरं च।। ऋ० ८१४११२ अर्थ - कर्मों, विद्वानों और साधारण मनुष्यों के लोक परलोक में जाने के लिये जन्म मरण रूपी दो मार्ग हैं, इन्हीं दो मार्गों से सम्पूर्ण जीव इस लोक से परलोक में और परलोक से इस लोक में जाते और आते हैं, इन दो मार्गों की प्राप्ति का कारण माता और पिता हैं, यहां लोक से तात्पर्य इस जन्म का और परलोक से जन्मान्तकर का है।। अन्धन्तमः प्रविशन्ति येऽसंभूतिमुपासते। ततोभूय इ वते तमो य उ सम्भूत्याँरता: ।। यजु०४०। ९ अर्थ- जो पुरूष असम्भूति=प्रकृति की ईश्वर मानकर उपासना करते हैं वह अन्धतम=गाढ़ अन्धकार को प्राप्त होते हैं और जो सम्भूति=प्रकृति के काय्र्यों की ईश्वरभाव से उपासना करते हैं वह और भी अन्धतम को प्राप्त होते हैं।। असंभूतिं च विनाशं च यस्तद्वेदोभयँसह । विनाशेन मृत्युंतीत्र्वा सम्भूत्यामृतमश्नुते।। यजु० ४० । ११ अर्थ- प्रकृति की ईश्वरभाव से उपासना करने वाले अमृत=चिकाल तक अमरणरूप प्रकृतिलयता को प्राप्त होते हैं अर्थात् चिरकाल तक प्रकृति में लीन होकर रहते है, प्रकृति में लीन होने का नाम ही अन्धत है और प्राकृत पदार्थों की ईश्वरभाव से उपासना करने वाले कुछ काल तक मृत्यु अतिकमण करजाते अर्थात् स्थूलशरीर से रहित होकर उन्हीं प्राकृत पदार्थों में लीन पुरूषों का नाम विदेह है, इनका वर्णन १९ वें सूत्र में विस्तार पूर्वक करेंगे।। इन दोनों प्रकार के विषयों में दुःखरूपता का अनुसन्धान करने से जिस पुरूष की इच्छा निवृत्त होगई है वही योग का अधिकारी है, उस योग के अधिकारी की जो लोक तथा परलोक के विषयों में हेय उपादेयभाव से रहित चित्तस्थिति अर्थात् उपेक्षा बुद्धि है उसी का नाम अपरवैराग्य है।। इस वैराग्य के यतमान, व्यतिरेक, एकेन्द्रिय, वशीकार यह चार भेद हैं, इन सबका यथाक्रंम पृथक २ लक्षण करना उचित था परन्तु प्रथम के तीन वैराग्यों का आचार्य्य ने इसलिये पृथक् २ लक्षण नहीं किया कि उनकी प्राप्ति के बिना चैथे की प्राप्ति नहीं होसकती अर्थात् तीनों की सिद्धि के अनन्तर ही वशीकार वैराग्य की प्राप्ति होती है, इन चारों वैराग्यों के लक्षण इसप्रकार हैं कि चित्त में जो राग द्वेष आदि दोषरूप मल हैं उन्हीं के कारण इन्द्रियों की अपने २ विषयों में प्रवृत्ति होती है “मेरे इन्द्रियों की विषयों में प्रवृत्ति न हो” ऐसा विचारक मैत्री आदि भावना के अनुष्ठान को “यतमानवैराग्य” कहते हैं, यतमान के अनन्तर ऐसा विचार करना कि मेरे चित्त के कई द्वोष निवृत्त होगये हैं और कई निवृत्त हो रहे हैं अथवा इसी प्रकार शेष भी निवृत्त होजायेंगे, इस प्रकार निवृत्त हुए दोषों के निर्धारण को “व्यतिरेकवैराग्य” कहते हैं, जब चित्त के मल निवृत्त होजायँ तब विषयों में प्रवत्ति के लिये सर्व इन्द्रिय असमर्थ होजाते हैं, उन दोषों का जो केवल इच्छारूप से रहना है इसी को “एकेन्द्रियवैराग्य” कहते हैं, और दिव्य अदिव्य अर्थात् उत्तम, अधम, विषयों की प्राप्ति होने पर भोग इच्छा के त्याग को “वशीकारवैराग्य” कहते हैं।। इन चार प्रकार के अपरवैराग्य का भलेप्रकार अनुष्ठान करने से चित्त की राजस, तामस, सर्ववृत्तियें निरूद्ध होकर सम्प्रज्ञात योग की प्राप्ति होती है, इसलिये वह अपरवैराग्य सम्प्रज्ञात योग का अन्तराड. और असम्प्रज्ञात योग का वहिरड. साधन है।। सं०- अब परवैराग्य का लक्षण करते हैं-

सूत्र :तत्परं पुरुषख्यातेः गुणवैतृष्ण्यम् ॥॥1/16
सूत्र संख्या :16

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पद०-तत्। परं । पुरूपरव्याते:। गुणवैतृष्ण्यम्। पदा०- (पुरूपरव्याते:) विवेकज्ञान से (गुणवैतृष्ण्यम्) सत्त्वादि गुणों में होने वाली इच्छा की विवृत्ति को (तत्, परं) परवैराग्य कहते हैं।।

व्याख्या :
भाष्य- सम्प्रज्ञातसमाधि की दृढ़ता से प्रकृति का विवेक ज्ञान होता है, उस विवकेज्ञान से इस्तामलक की भांति पुरूष का साक्षात्कार होजाता है अर्थात् प्रकृति तथा प्रकृति के कार्य्य निखिल पदार्थों से भिन्न पुरूष प्रतीत होता है, ऐसे पुरूष के साक्षात्कार से विवेकी पुरूष को स्थूल सूक्ष्म विषयों के भोग की इच्छा सर्वथा निवृत्त होजाती है इसी को “परवैराग्य” कहते हैं।। तात्पर्य यह है कि सम्प्रज्ञात समाधिक का फल प्रकृति पुरूष का विवेक ज्ञान भी प्रकृति का कार्य्य होने से दुःखरूप है उसको दुःखरूप जानकर तृप्णा का त्याग करना परवैराग्य कहलाता है, इसी को ज्ञान की पराकाष्ठा होने के कारण ज्ञानप्रसाद भी कहते हैं, इसी का फल मोक्ष है और यह धर्ममेघसमाधि की सीमा होने के कारण सबसे उत्कृष्ट है।। सं०- चित्ततृत्तिनिरोध के साधन अभ्यास तथा वैराग्य का लक्षण कथन करके अब अपरवैराग्य से जिस पुरूष के चित्त की राजस, तामस वृत्तियों का निरोध होगया है उसको प्राप्त होने वाली सम्प्रज्ञातसमाधिक का लक्षण करते हैं-

सूत्र :वितर्कविचारानन्दास्मितारुपानुगमात्संप्रज्ञातः ॥॥1/17
सूत्र संख्या :17

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पद०- वितर्कविचारानन्दास्मितारूपानुगमात् । सम्प्रज्ञात:। पदा०- (वितर्कविचारानन्दास्मितारूपानुगमात्) वितर्क, विचार, आनन्द और अस्मिता, इन चारों के सम्बन्ध से जो समाधि होती है उसको (सम्प्रज्ञातः) सम्प्रज्ञात कहते हैं।।

व्याख्या :
भाष्य- वितर्क=विविधानां प्रकृतितत्कार्य्यभूतानांदार्थानांतर्कणंग्र-हणंज्ञानमितियावदस्यास्तीतिवितर्क:=परमात्मा, तद्विषयत्वात्समाधिरपिवितर्क:=सम्पूर्ण प्रकृति तथा प्राकृत पदार्थों को ग्रहण करने वाले परमात्मा के सर्वज्ञातृस्वरूप को विषय करनेवाली चित्तवृत्ति का नाम “वितर्क” है।। विचार=“चर=गतिभक्षणयोः” इस धातु से “विचार” शब्द सिद्ध होता है, विशेषण=अपरोक्षेण चरणं=सर्ववस्तूनां ग्रहणं=विचार:=परमात्मा के ज्ञान मात्र को विषय करनेवाली चित्तवृत्ति का नाम “विचार” है।। आनन्द=आनन्दयतीति आनन्दः= प्राणीमात्र को आनन्दित करने वाले परमात्मा के आननद गुण को विषय करनेवाली चित्तवृत्ति का नाम “आनन्द” है।। अस्मिता=“तदात्मानमेवावेदहंन्नाहृास्मीति” वृहदा० १। ९ । १०= वह परमात्मा जिस प्रकार सम्पूर्ण जगत् को जानता है वैसे ही अपने स्वरूप को भी जानता है कि मैं ब्रहृा हूं, इस परमात्मानुभव सिद्ध ज्ञान तथा आनन्दादि अनन्त कल्याणगुणविशिष्ट परमात्मा के स्वरूप को विषय करनेवाली चित्तवृत्ति का नाम “अस्मिता” हैं और इन्ही चारो वृत्तियों के समुदाय का नाम “सम्प्रज्ञातसमाधि” है।। यहां इतना विशेष जानना आवश्यक है कि इन चारों में प्रथम का नाम गृहीतृसमापत्ति, और तीसरी तथा चौथी का नाम ग्राहृासमापत्ति है, इसका वर्णन इसी पाद के ४१ वें सूत्र में विस्तारपूर्वक किया जायगा।। और जो आधुनिक टीकाकारों ने इस चार प्रकार के सम्प्रज्ञात योग को स्थूलालम्बन में लगाया है अर्थात् जिसमें जीव चतुर्भुज मूर्ति का ध्यान करता है उसका नाम वितर्क, जिसमें सूक्ष्म पंचतन्मात्रादिकों का ध्यान करता है उस का नाम विचान, जिसमें अहंकार का ध्यान करता है उसका नाम आनन्द और जिसमें अहंकार, बुद्धि वा प्रकृति का ध्यान करता है उसका नाम अस्मिता है, यह व्याख्यान सर्वथा इस दर्शन के आशय से विरूद्ध है, क्योंकि इस दर्शन में ईश्वर से भिन्न जड़ पदार्थों में चित्तवृत्तिं के निरोध का नाम समाधि कहीं भी नहीं, यदि जड़ पदार्थों में चित्ततृत्तिनिरोध का नाम समाधि होता तो “तदाद्रष्टुःस्वरूपेऽवस्थानम्” इस सूत्र में चेतनस्वरूप परमात्मा में चित्तवृत्ति का निरोध कथन न किया जाता, इससे पाया जाता है कि यह सम्प्रज्ञात, असम्प्रज्ञात दोनों प्रकार का योग परमात्मा में चित्तवृत्तिनिरोध को कहता है।। ननु-यदि आधुनिक टीकाकारों के मत में वितर्कादि चार प्रकार का योग स्थूल पदार्थों मे चित्तवृत्तिनिरोध का नाम है तो “वितर्कश्चितस्यालम्बनेस्थूलआभोग:”=चित्त के आलम्बन में स्थूल भोग का नाम वितर्क है, इत्यादि भाष्य में स्थूल आभोग क्यो माना गया? उत्तर-इस भाष्य को न समझकार ही आधुनिक टीकाकारों ने भूल की है, क्योंकि उक्त भाष्य में जो वितर्कसमाधि को स्थूल आभोग कथन किया गया है वह स्थूल पदार्थों में होने के कारण नहीं किया किन्तु जिस सर्वज्ञातृत्वधर्म को मुख्य मानकर परमात्मा विषयक वितर्कसमाधिक होती है वह स्थूल सूक्ष्म सर्व पदार्थों की अपेक्षा रखने से स्थूल है, इस कारण उक्त समाधि को स्थूल आभोग कथन किया है कि और “सर्वज्ञातृत्व” की अपेक्षा ज्ञान सूक्ष्म है इसलिये तद्विषयक विचार समापत्ति को सूक्ष्म आभोग कथन किया है, किसी जड़ पदार्थ की अपेक्षा से नहीं, क्योकि वैदिकसिद्वान्त में एक ईश्वर में ही चित्त लगाने का नाम सम्प्रज्ञात-समाधि है, इसी अभिप्राय से कहा है कि “सर्वएतेसालम्बनाः समाघयः” =यह चार प्रकार की समाधि आलम्बन वाली है अर्थात् परमात्मा के स्वरूप को अवलम्ब रखकर की जाती है, इससे यह नहीं पाया जाता कि उक्त विर्कादि चारो समाधियें जड़ पदार्थों का ध्येय मानकर कीजाती हैं, यदि ऐसा होता तो “इेश्वरप्रणिधानाद्वा” इस २३ वें सूत्र में ईश्वर को अवलम्ब रखकर समाधि का वर्णन न किया जाता और नाही विक्षेपों के अभाव के लिये “तत्प्रतिपेघार्थमेकतत्त्वाभ्यास:” इस १३ वें सूत्र में एकमान परमात्मा का अवलम्बन सिद्ध किया जाता, इत्यादि प्रमाणों से स्पष्ट पाया जाता है कि आधुनिक टीकाकारों ने योगभाष्य के स्थूलादि शब्दों को न समझकर ही इस चार प्रकार के सम्प्रज्ञात योग को जड़विषयक वर्णन करदिया है जो वैदिक सिद्धान्त से सर्वथा विरूद्ध है।। इसका स्पष्ट अर्थ यह है कि जिसमें वितर्कादि द्वारा ईश्वर के स्वरूप का ज्ञान रहता है उसका नाम “सम्प्रज्ञातयोग” है।। सं०-अब सम्प्रज्ञातसमाधि के अनन्तर परवैरागय से होनेवाली असम्प्रज्ञातसमाधि का लक्षण करते हैः-

सूत्र :विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः संस्कारशेषोऽन्यः ॥॥1/18
सूत्र संख्या :18

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पद०- विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्व: । संसकारशेष:। अन्य: । पदा०- (विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्व:) निखिलवृत्तिनिरोध के कारण परवैराग्य के अभ्यास से होने वाली (संसकारशेष) संस्कारशेष चित्त की स्थिति का नाम (अन्य:) असम्प्रज्ञातसमाधि है।।

व्याख्या :
भाष्य-जैसे भुना चना अंकुर जनने की सामथ्र्य से रहित होकर केवल आकार मात्र से शेष रहजाता है, इसी प्रकार परवैराग्य के अभ्यास से चित्त की सम्पूर्ण वृत्तियों का निरोध होजाता है, फिर आगे अन्य वृत्ति के जनने की सामथ्र्य नहीं रहती, उस अवस्था का नाम संस्कारशेष है और वितर्कादि सर्ववृत्तियों के अभाव का नाम विराम है, और विराम के कारण ज्ञान की पराकाष्ठारूप परवैराग्य का नाम प्रत्यय है, उस प्रत्यय के पुनः २ अभ्यास से सर्ववृत्तियों के निरोध होजाने पर जो चित्त का संस्काररूप से अवस्थान विशेष है उसको “असम्प्रज्ञात“ कहते हैं।। भाव यह है कि जिस अवस्था में निरालम्बन हुआ चित्त अपने स्वरूप मात्र में स्थित होता है उस अवस्था का नाम “असम्प्रज्ञात” है।। सूत्र में “अन्य:“ पद से असम्प्रज्ञात समाधि को बोधन किया है, “संस्कारशेष:” पद से उसका लक्षण और “विरामप्रत्याभ्यासपूर्व:” पद से उपाय का कथन किया है, निरालम्बन होने के कारण इसी समाधि का नाम निर्वीज समाधि है, जो योगी इस समाधि का प्राप्त होते हैं उनको ब्रहाविद्वरिष्ठ कहते हैं, यही समाधि योग का पराकाष्ठा है, इसी अवस्था को लेकर सांख्य तथा योग में कहा है कि “समाधिसुपुप्तिमोक्षेपुनहारूपता” सां०५। ११६=समाधि, सुषुप्ति और मोक्ष में ब्रहाभाव की प्राप्ति होती है, “तदाद्रष्टुःस्वरूपेऽवस्थानम्” योग० १। ३=सम्पूर्ण वृत्तियों के निरोध से चेतनस्वरूप पुरूष अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित हुआ परमात्मा में स्थित होता है, इसी का फल मोक्ष है, अतएव मुमुक्षजनों को यह समाधि उपादेय है।। सं०- अब पूर्वोक्त निरोध का भेद दिखलाते हुए यह निरूपण करते हैं कि मुमुक्षजनों के लिये कौनसा निरोध ग्राहृा और कौनसा त्याज्य है:-

सूत्र :भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानम् ॥॥1/19
सूत्र संख्या :19

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पद० - भवप्रत्यय:। विदेहप्रकृतियानाम् । पदा० - (विदेहप्रकृतियानाम्) विदेह और प्रकृतियलं पुरूषों की वृति का निरोध (भवप्रत्ययः) अज्ञानजन्य होती है।।

व्याख्या :
भाष्य - संस्कारशेष चित्त का निरोध भवप्रत्यय और उपायप्रत्यय भेद से दो प्रकार का है, जो पुरूष परमात्मा के स्वरूप को न जानकार पंचभूत तथा इन्द्रियों मे पमरमात्मभाव का अभिमान कर उनकी उपासना करते हैं वह शरीर छोड़ने के अनन्तर उन्हीं में लीन होते है और अन्त में उनका चित्त संस्काररूप से रहजाता है जैसे पुरूषों को विदेह कहते हैं, क्योंकि इनका स्थूल देह नहीं रहता और जो पुरूष प्रकृति, महत्तत्त्व, अहंकार अथवा पश्चातन्मात्र की परमात्माभाव से उपासना करते हैं उनके चित्त की वासना इन्हीं के समान हो जाती है और वह शरीरान्त के अनन्तर इन्हीं प्रकृति आदि में लीन होजाते हैं ऐसे पुरूषों को “प्रकृतिलय” कहते हैं।। इन दोनों प्रकार के पुरूषों का वर्णन यजु० ४०। ९ - ११ मंत्रों में किया गया है जिनका अर्थ इसी पाढ़ के १५ वें सूत्र में कर आये हैं, उक्त दोनों पुरूषों को जा लयावस्था में चित्तवृत्ति निरोध होता है उसको “भवप्रत्यय” कहते हैं, भव नाम अज्ञान का है अर्थात् प्रकृति आदि अनात्म पदार्थों में परमात्माबुद्धि होने के कारण इस निरोध को “भवप्रत्यय” कहते हैं।। तात्पर्य्य यह है कि अज्ञानजन्य वित्तवृत्ति के निरोध का नाम “भवप्रत्यय” है और यह प्रकृति आदि अनात्म पदार्थों में लय होने से होता है परवैराग्य से नहीं, इसलिये यह निरोध योगाभास है, क्योंकि इसमें निरूद्ध हुआ चित्त मोक्ष का हेतु नहीं, अतएव यह निरोध मुमुक्षुजनों का उपादेय नहीं किन्तु सर्वथा त्याज्य है।। सं० - अब उपायप्रत्ययनिरोध का लक्षण करते हैं:-

सूत्र :श्रद्धावीर्यस्मृति समाधिप्रज्ञापूर्वक इतरेषाम् ॥॥1/20
सूत्र संख्या :20

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पद० - श्रद्धावीर्य्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वक:। इतरेषाम्। पदा० - (श्रद्धावीर्य्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वक:) श्रद्धा, वीर्य्य, स्मृति, समाधि तथा प्रज्ञादि उपायों से होने वाले (इतरेषाम्) योगियों के चित्तवृत्त्विनिरोध का नाम उपायप्रत्यय है।।

व्याख्या :
भाष्य- प्रकृति पुरूष का विवेक मोक्ष का कारण है, उस विवेक का साधन यो मुझको प्राप्त हो, उस प्रकार की इच्छा से लोक तथा परलोक के विषयों में तृष्णा रहित पुरूष की योग में होनेवाली रूचि को “श्रद्धा” कहते हैं।। श्रद्धालु तथा विवे के अर्थी पुरूष का योगसम्पादन के लिये जो उत्साह है उसको “वीर्य्य” कहते हैं।। उत्साहवाले पुरूष को वेद, अनुमान तथा आचाय्र्योपदेश से जाने हुएं योगसाधनों में होने वाले स्मरण का नाम “स्मृति” है।। योगसाधनों के अनुष्ठान से प्राप्त हुई सम्प्रज्ञातसमाधिक का नाम “समाधि” है। समाहित चित्त में उत्पन्न हुए प्रकृति के विवेक का नाम “प्रज्ञा” है। प्रज्ञा के अनन्तर जो पुरूष को गुणवैतृष्ण्य अर्थात् उक्त प्रज्ञा में भी अलंप्रत्यय=तृप्ति होती है उसका नाम परवैराग्य है, इस प्रकार श्रद्धा आदि उपायों से जो योगियो के चित्त का निरोध होता है उसको “उपायप्रत्यय” कहते हैं इसी का नाम असम्प्रज्ञात समाधि है जिसका लक्षण १८ वें सूत्र में किया गया है।। यहां श्रद्धा आदि उपायों का परस्पर कार्य्यकारणभाव है अर्थात् प्रथम श्रद्धा, श्रद्धा से वीर्य्य, वीर्य्य से स्मृति, स्मृति से समाधि, समाधि से प्रज्ञा और प्रज्ञा से परवैराग्य तथा परवैराग्य से असम्प्रज्ञात समाधि होती है, इसी अभिप्राय से सूत्र में श्रद्धादि उपायों का क्रम दिखलाया गया है।। सं० -अब उक्त श्रद्धा आदि साधनों वाले योगियों के मध्य में जिनको शीघ्र असम्प्रज्ञातसमाधि का लाभ होता है उनका कथन करते है:-

सूत्र :तीव्रसंवेगानामासन्नः ॥॥1/21
सूत्र संख्या :21

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पद० - तीव्रसंवेगानाम् । आसन्न:। पदा० - (तीव्रसंवेगानाम्) तीव्रवैराग्य वाले योगियों को (आसन्न:) शीघ्र समाधि तथा उसके फल कैवल्य का लाभ होता है।।

व्याख्या :
भाष्य - संवेग नाम वैराग्य का है पूर्वजन्म के संस्कार तथा अदृष्ट की विलक्षणता के कारण मृदु, मध्य, अधिमात्र भेद से श्रद्धा आदि उपाय तीन प्रकार के है, इनके तीन भेद होने से इन उपायों वाले योगियों के भी तीन भेद हैं अर्थातृ मृदूपाय, मध्योपाय और अधिमात्रोपाय, इन तीनों योगियों के भी मृदुसंवेग, मध्यसंवेग, अधिमात्रसंवेग, इस प्रकार एक २ के तीन २ भेद होने से नौ भेद हैं अर्थात् श्रद्धा आदि उपाय तथा वैराग्य के मृदु आदि भेद से (१) मृदुपायमृदुसंवेग (२) मृदुपायमध्यसंवेग (३) मृदुपायाधिमात्रसंवेग (४) मध्योपायमृदुसंवेग (५) मध्योपायमध्यसंवेग (६) मध्योपायाधिमात्रसंवेग (७) अधिमांत्रोपायमृदुसंवेग (८) अधिमात्रोपायमध्यसंवेग (९) अधिमात्रोपायाधिमात्रसंवेग, इस प्रकार योगियों के नौ भेद है, इनमें अन्तिम योगी को शीघ्र ही असम्प्रज्ञातसमाधि तथा उसके फल का लाभ होता है। सं० - अब उक्त समाधि की प्राप्ति में और विशेषता कथन करते हैं:-

सूत्र :मृदुमध्याधिमात्रत्वात्ततोऽपि विशेषः ॥॥1/22
सूत्र संख्या :22

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पद० - मृदुमध्याधिमात्रत्वात्। तत:। अपि । विशेष:। पदा० - (मृदुमध्याधिमात्रत्वात्) मृदु, माध्य, अधिमात्र, इस प्रकार तीव्रता के पुनः तीन भेद होने से अधिमात्रतीव्रसंवेग योगियों को (तत:, अपि) पूर्व की अपेक्षा (विशेष:) आसन्नतर, आसन्नतम अर्थात् अति शीघ्र समाधि तथा उसके फल का लाभ होता है।।

व्याख्या :
भाष्य - मन्दतीव्र, मध्यतीव्र, अधिमात्रतीव्र, इसप्रकार तीव्रसंवेग के तीन भेद होने से जिन योगियों का संवेग अधिमात्रतीव्र और श्रद्धा आदि उपाय अधिमात्र हैं उनको पूर्व की अपेक्षा आसन्नतर तथा आसन्नतम समाधि का लाभ होता है।। तात्पर्य्य यह है कि मृदुतीव्रसंवेग अधिमान्नोपाय योगी को आसन्न, मध्यतीव्रसंवेग, अधिमान्नोपाय योगी को आसन्नतर तथा अधिमात्रतीव्रसंवेग अधिमात्रोपाय योगी को आसन्नतम समाधि का लाभ होता है।। सं०- अब उक्त समाधि के आसन्नतम लाभ में अन्य सुगम उपाय कथन करते हैं:-

सूत्र :ईश्वरप्रणिधानाद्वा ॥॥1/23
सूत्र संख्या :23

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पदा० - ईश्वरप्रणिधानात् । वा। पदा० - (ईश्वरप्रणिधानात्) इश्ष्वर के प्राणिधान अर्थात् भक्तिविशेष से आसन्नतम समाधि का लाभ होता है।।

व्याख्या :
भाष्य - प्रणिधान भक्तिविशेष को कहते हैं जिसका वर्णन सूत्रकार आगे करेंगे, जिनका अधिमात्रतीव्रसंवेग है और ईश्वर का प्राणिधान करते हैं ऐसे यह भी स्मरण रहे कि प्रणिधान शब्द से द्वितीयपाद के आदि में निरूपण किये हुए प्रणिधान का ग्रहण नहीं, क्योंकि वह सम्प्रज्ञातसमाधि का साधन है असम्प्रज्ञात का नहीं।। सं० - अब जिस ईश्वर के प्रमिणधान से योगियों का आसन्नतम समाधि का लाभ होता है उसका निरूपण करते हैं:-

सूत्र :क्लेश कर्म विपाकाशयैःपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः ॥॥1/24
सूत्र संख्या :24

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पद०-क्केशकमंविपाकाशयै:। अपरामृष्ट:। पुरूषविशेष:। ईश्वर: ।। पदा० -(क्केशकमंविपाकाशयै:) क्कश, कर्म, विपाक, आशय, इनसे (अपरामृष्ट:) रहित जो (पुरूषविशेष:) पुरूषविशेष है, उसको (ईश्वर:) ईश्वर कहते हैं।।

व्याख्या :
भाष्य-विद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवश, यह पांच क्केश हैं, और शुभ अशुभ दो प्रकार के कर्म हैं, कर्मों के फल, जाति, आयु, भोग, इनका नाम “विपाक” है इनके अनुसार चित्त में होनेवाली वासनाओं को “आशय” कहते हैं, इन सब के सम्बन्ध से रहित पुरूष विषेश का नाम “ईश्वर” है।। सं० - अब पूर्वोक्त ईश्वर के सद्भाव में प्रमाण कथन करते हैं:-

सूत्र :तत्र निरतिशयं सर्वज्ञबीजम् ॥॥1/25
सूत्र संख्या :25

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पद०- तत्र। निरतिशयं। सर्वज्ञवीजम्। पदा० - (तत्र) उस ईश्वर में (निरतिशयं) सम से अधिक (सर्वज्ञजीवम्) सर्वज्ञता का कारण ज्ञान ही प्रमाण है।।

व्याख्या :
भाष्य - जो वस्तु सातिशय=परिमित होती है वह आगे बढ़ती २ किसी अन्तिम सीमा पर पहुंचकर निरतिशय=अपरिमित होजाती है अर्थात् उसकी कोई उन्नति की सीमा होती है जिसके समान कोई अन्य वस्तु नहीं होती, जैसाकि परिणाम परिमित है वह छोटे से छोटा होकर अणु में और बड़े से बड़ा आकाशदिकों में अपरिमित होजाता है, इसी प्रकार अस्मदादि जीवों को ज्ञान भी परिमित है, क्योंकि कोई जीव थोड़ा और कोई उससे अधिक और कोई उससे भी अधिक जानता है, यह ज्ञान जहां अपरिमित होजाता है वह ईश्वर है, उसी को सब पुरूषों से उत्तम होने के कारण पुरूषोंत्तम कहते है, यही ’पुरूषविशेष’ पद का अर्थ है, जिसप्रकार निरतिशय=अपरिमित ज्ञान ईश्वर में प्रमाण है इसी प्रकार अपरिमित कियाशक्ति भी ईश्वर में प्रमाण है।। सं० - नुन, सृष्टि के आरम्भ में उत्पन्न हुए अग्नि वायु आदि महर्षियों को ही ईश्वर क्यों न मानाजाय, क्योंकि वह सर्वविद्या के मूलभूत वेदों के प्रकाशक होने से अपरिमित ज्ञान का आश्रय होसकते हैं, इनसे भिन्न ईश्वर मानाना व्यर्थ है? उत्तर:-

सूत्र :स एष पूर्वेषामपिगुरुः कालेनानवच्छेदात् ॥॥1/26
सूत्र संख्या :26

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पद० - पूर्वेषाम् । अपि । गुरूः। कालेन । अनवच्देदात्। पदा० - (पूर्वेषाम्) वह ईश्वर पूर्व ऋषियों का (अपि) भी (गुरूः) गुरू है, क्योंकि (कालेन, अनवच्देदात्) उसका काल से अन्त नहीं होता ।।

व्याख्या :
भाष्य - वह ईश्वर अग्रि, वायु आदि महर्षियों का भी गुरू है अर्थात् उनको वेदोपदेष करनेवाला है, उसका किसी प्रकार भी काल से अन्त नहीं होता और अग्रिआदि ऋषियों का काल से अन्त होजाता है, इसलिये वह ईश्वर नहीं कहला सकते, क्योंकि वह उत्पन्न होते और मरते हैं, अग्रिआदि महर्षियों द्वारा जो वेद का प्रकाशक है वही ईश्वर है।। वार्तिककार विज्ञानभिक्षु ने इस सूत्र का यह अर्थ किया है कि वह ईश्वर (पूर्वेषाम्) पूर्व सर्ग में होनेवाले ब्रहृा, विष्णु महेशादिकों का भी गुरू अर्थात् पिता है और विवाद्वारा ज्ञान का दाता है, क्योंकि (कालेनानवच्छेात्) ब्रहृा आदि का काल से अन्त हो जाता है और वह अविनाशी गुरू के बिना उत्पन्न वा ज्ञानयुक्त नहीं होसकते, अतएव जिसका काल से कदापि अन्त नहीं और जा ब्रहृा, विष्णु आदिकों का भी उत्पन्न करने वाला तथा वेदविद्या के द्वारा ज्ञान का देनेवाला है वही ईश्वर है। सं० - अब ईश्वर का नाम कथन करते हैं:-

सूत्र :तस्य वाचकः प्रणवः ॥॥1/27
सूत्र संख्या :27

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पद० - तस्य। वाचक: । प्रणव: । पदा० - (तस्य) उस ईश्वर का (वाचक:) नाम (प्रणव:) ओ३म् है। भाष्य - ओ३म् यह ईश्वर का मुख्य नाम है। सं० - अब प्रणिधान का स्वरूप कथन करते हैं:-

सूत्र :तज्जपः तदर्थभावनम् ॥॥1/28
सूत्र संख्या :28

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पद० - तज्जप:। तदर्थभावनम् । पदा० - (तज्जप:) ओ३म् का जप और (तदर्थभावनम्) उसके वाच्य ईश्वर के पुनः २ चिन्तन करने को प्रणिधान कहते हैं।।

व्याख्या :
भाष्य - ओ३म् का जप करते हुए परम प्रेम से ईश्वर के चिन्तन का नाम “प्रणिधान” है इसीको भक्तिविशेष तथा उपासना भी कहते हैं जिसका वर्णन भाष्यकार इस प्रकार करते हैं कि:- स्वाध्यायाद्योगमासीत योगात्स्वाध्यायमामनेत् । स्वाघ्याययोगसम्पाया परमात्मा प्रकाशते ।। अर्थ- स्वाध्याय=ओंकार जब के अनन्तर योग अर्थात् समाधि का अभ्यास करे और समाधिक के अनन्तर ओंकार का जप करे, क्योंकि ओंकार के जप तथा समाधि के अभ्यास से परमात्माका प्रकाश होता है।। भाव यह है कि जब योगी वैराग्यसहित प्रणवोपसना=प्रणिधान करता है तब ईश्वर प्रसन्न होकर सकंल्पमात्र से ही योगी=उपासक के सकंल्पों को पूर्ण कर देता है, क्योंकि ईश्वर सत्यसंकल्प और सर्वशक्तिसम्पन्न है वह प्रणिधान से प्रसन्न होकर जब कृपा करता है जब उसकी कृपा से योगी का चित्त शान्त होकर समाधि में स्थित होंजाता है।। सं० - अब ईश्वरप्रणिधान का फल निरूपण करते हैं:-

सूत्र :ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभवश्च ॥॥1/29
सूत्र संख्या :29

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पद०- ततः। प्रत्यक्चेतनाधिगम:। अपि। अन्तरायाभाव:। च। पदा०- (तत:) ईश्वरप्रणिधान से (प्रत्यक्चेतनाविगम:) पुरूष का साक्षात्कार (च) और (अन्तरायाभाव:) उसके साधनयोग में होनेवाले विघ्रों की निवृत्ति (अपि) होती है।।

व्याख्या :
भाष्य - ईश्वरप्रणिधान अर्थात् प्रणवोपासना से योगी को केवल समाधि का लाभ ही नहीं होता किन्तु योग के प्रतिबन्धक सर्व विघ्रों की निवृत्ति होकर प्रकृति तथा प्राकृत पदार्थों से भिन्न परमात्मा के यथार्थ स्वरूप का साक्षात्कार भी होता है।। यहां क्रम इसप्रकार जानना चाहिये कि प्रथम ईश्वरप्रणिधान होता है, उसके अनन्तकर योग के विघ्रों की निवृत्ति होकर सम्प्रज्ञात समाधि की प्राप्ति होती है और फिर प्रकृति पुरूष का विवके उद्य होता है, तत्पश्चात् वैराग्य होता है फिर इसके अनन्तर असम्प्रज्ञात समाधि होती है, पश्चात् परमात्मा का प्रकाश और उसके प्रकाश के अनन्तर कैवल्य=मोक्ष का लाभ होता है।। स्ं० - अब प्रसन्न संगति से योग के विघ्रों का निरूपण करते है:- व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्ध-

सूत्र :व्याधि स्त्यान संशय प्रमादालस्याविरति भ्रान्तिदर्शनालब्धभूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपाः ते अन्तरायाः ॥॥1/30
सूत्र संख्या :30

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पद०- व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्धभूमिकत्वानवस्थितत्वानि। चित्तविक्षेपा:। ते। अन्तराया:। पदा०- (व्यापिधस्त्यानसंशय०) व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आलस्य, अविरित, भ्रान्तिदर्शन, अलब्धभूमिकत्व, अनवस्थितत्व, यह नव चित्तको विक्षिप्त=चंचल करते हैं, अतएव (ते) यह (अन्तरायाः) योग में विघ्र हैं।।

व्याख्या :
भाष्य- शरीर में बात, पित्त, कफ यह तीन मुख्यधातु हैं, इन्हीं से शरीर की स्थिति होती है और अन्नादि के खानपान से रूधिरादि परिणाम का नाम रस है, धातु, रस और इन्द्रियों की विषमता से शरीर में होने वाले ज्वरादि रोगों का नाम “व्याधि” है, चित्त में इच्छा होने पर भी कर्म करेन की अशक्ति का नाम “स्त्यान” है, मैं योग का करसकुंगा वा नहीं करसकुंगा, इस प्रकार के ज्ञान को “सशय” कहते हैं, यम नियमादि योग के आठ अंगों को परित्याग करने का नाम “प्रमाद” है, योग साधनों के अनुष्ठानकाल में कफ आदि से शरीर के भारी हो जाने तथा तमोगुण से चित्त के भारी होजाने का नाम “आलस्य” है, विषयों में प्रीति का नाम “अविरित” है, गुरू उपदेश से ज्ञात हुए योगसाधनों में विपरीत ज्ञान का नाम “भ्रान्तिदर्शन” है, योगसाधनों के अनुष्ठान से वक्ष्यमाण मधुमति आदि भूमियों की अप्राप्ति को “अलब्धभूमिकत्व” कहते हैं, उक्त भूमियों के प्राप्त होने पर चित्त के स्थिर न रहने का नाम “अनवस्थितत्व” है।। यह नव चित्तविक्षेप प्रमाण आदि वृत्यिों को उत्पन्न करक चित्त को चंचल करते हैं, इन्हीं का नाम योगान्तराय अथवा योगविघ्र हैं, क्योंकि यह योग के विरोधी हैं और इन्हीं को योगमल भी कहते हैं।। यहां यह भी स्मरण रहे कि संषय और भ्रान्तिदर्शन, यह दोनों चित्त की वृत्तिरूप होने से वृत्तिनिरोधरूप योग के साक्षात् प्रतिबन्धक हैं और व्याधि आदि सात चित्तवृत्ति के सहचारी होने से प्रतिबन्धक हैं। सं०- अब उक्त विक्षेपों के साथ २ होनेवाले अन्य विघ्रों का निरूपण करते हैं:-

सूत्र :दुःखदौर्मनस्याङ्गमेजयत्वश्वासप्रश्वासाः विक्षेप सहभुवः ॥॥1/31
सूत्र संख्या :31

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पद०-दुःखदौर्मनस्यागंमेजयत्वश्वासप्रश्वासा:। विक्षेपसहभुव:। पदा० -(दुःखदौर्म०) दुःखदौर्मनस्य, अंडगमेजयत्व, श्वास, प्रश्वास, यह (विक्षेपसहभुव:) विक्षेपों के साथ २ होनेवाले पांच विघ्र है।।

व्याख्या :
भाष्य - प्रतिकूल देवनीय अर्थात् प्राणीमात्र को जिससे द्वेष है उसको “दुःख” कहते हैं और वह आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक भेद से तीन प्रकार का है।। इच्छा की पूर्ति न होने से जो चित्त में क्षोभ होता है उसका नाम “दौर्मनस्य” है, आसन और मन की स्थिरता को भंग करनेवाले शरीरकम्प का नाम “अड़गमेजयत्व” है, बिना प्रयत्न अर्थात् स्वतः ही बाहर की वायु का नासिका द्वारा भीतर “प्रश्वास” और भीतर की वायु का बिना प्रयत्न बाहर आना “श्वास” कहलाता है, यहं पांच पूर्वोक्त योगघ्रिों के सहचारी विघ्र हैं उनके होने से हेाते और न होने से नहीं होते।। भाव यह है कि यह सब विघ्र विक्षिप्तचित्त को हेाते हैं समाहितचित्त को नहीं, इसीलिये यह विक्षेपों के सहचारी कथन किये जाते हैं।। सं०- अब उक्त विव्रों की निवृत्ति का उपाय कथन करते हैं:-

सूत्र :तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्त्वाभ्यासः ॥॥1/32
सूत्र संख्या :32

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पद० - तत्प्रतिषेघार्थ। एकतत्त्वाभ्यास:। पदा० - (तत्प्रतिषेघार्थ) उन विघ्रों की निवृत्ति के लिये (एकतत्त्वाभ्यास:) एकमात्र ईश्वर का प्रणिधान करना ही आवश्यक है।।

व्याख्या :
भाष्य- यहां प्रकरण से “एकतत्त्व” पद का अर्थ ईश्वर है जिसमें “एकोदेवः” श्वे० ६ । ११ इत्यादि प्रमाण हैं, “अभ्यास” पद का अर्थ प्रणवोपासना है।। भाव यह है कि उक्त विघ्रों की निवृत्ति के लिये ईश्वर का प्रणिघान ही योगी को कत्र्तव्य है। और जो वात्र्तिककार तथा मधुसूदन सरस्वती आदि “एकतत्त्व” पद का अर्थ स्थूलतत्त्व करके उसके अभ्यास को उक्त विघ्नों की निवृत्ति का उपाय कथन करते हैं, यह ठीक नहीं, क्योंकि २९ वें सूत्र में ईश्वरप्रणिधान को ही विघ्नों की निवृत्ति का उपाय कथन करके इस सूत्र से उपसंहार किया है, यदि इस सूत्र में “एकतत्त्व” पद का अर्थ कोई स्थूल तत्त्व कियाजाय तो पूर्वसूत्र से इस सूत्र की एकवाक्यता नहीं रहती, अतएव “एकतत्त्व” पद का अर्थ ईश्वर ही होसक्ता है “स्थूल तत्त्व” नहीं ।। सं० - अब चित्तमल की निवृत्ति के लिये भावनाओं का उपदेश करते हैं, जिससे चित्त शुद्ध होकर ईश्वरप्रणिधान के योग्य होजाता है:-

सूत्र :मैत्री करुणा मुदितोपेक्षाणांसुखदुःख पुण्यापुण्यविषयाणां भावनातः चित्तप्रसादनम् ॥॥1/33
सूत्र संख्या :33

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पदा० -(मैत्रीकरूणामुदितोपेक्षाणां) मित्रता, दया, हर्ष और उदासीनता की (भावनात:) भावना से (चित्तप्रसादनम्) चित्त निर्मल होता है।।

व्याख्या :
भाष्य-मेरे इस मित्र को भलेप्रकार सुख बना रहे, इस प्रकार चित्त को मैत्री आदि के तत्पर करने का नाम “भावना” है, सुखी पुरूषों में मैत्री की भावना, इस दुःखी का दुःख कैसे निवृत्त होगा, इस प्रकार दुःखी पुरूषों में दया की भावना, धर्मात्मा जीवों के धर्म को देखकर “हां इसने शुभकर्म किया” इसप्रकार धार्मिक जीवों में मुदिता की भावना, अधर्मी पुरूषों के पापाचरण को देखकर पाप की उपेक्षा से उनमें उदासीनता की भावना करनी चाहिये, इससे चित्त के ईर्षा आदि मल निवृत्त होजाते हैं अर्थात् “मैत्रीभावना” से ईर्षा, “करूणा भावना” से अपकार की इच्छा, “मुदिता” ओर “उपेक्षा” भावना से क्रोध रूप मल की निवृत्ति हो जाती है, इन ईर्षा आदि मलों की निवृत्ति होजाने से निर्मल हुआ चित्त ईश्वर प्रणिधान में शीघ्र ही स्थिर होता है।। तात्पर्य्य यह है कि अभ्यास से शुद्ध हुआ चित्त ईश्वरप्रणिधान के योग्य होजाता है।। सं०- अब पूर्वोक्त मलों से रहित चित्त की स्थिति का अन्य उपाय कथन करते हैं-

सूत्र :प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य ॥॥1/34
सूत्र संख्या :34

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पद० - प्रच्छर्दनविधारणाभ्याम् । वा। प्राणस्य। पदा० - (वा) अथवा (प्राण्स्य) प्राणवायु के (प्रच्छर्दनविधारणाभ्याम्) रेचन और धारण से चित्त स्थिर होता है।

व्याख्या :
भाष्य- योगषास्त्र में कथन किये हुए प्रयत्न से नासिका द्वारा भीरत की वायु को शनै: २ बाहर निकालने का नाम “प्रच्छर्दन” और बाहर निकाली हुई प्राणवायु को बाहर ही इस प्रकार स्तम्भन करना कि वह शीघ्र भीतर प्रवेश न कर सके इसको वाहृा “विधारण” कहते हैं। यह प्रच्छर्दन विधारण पूरण विधारण का उपलक्ष है, नासिका द्वारा बाहर की वायु को शनै २ भीतर प्रवेश करने का नाम “पूरण” और भीतर की हुई वायु को कुछ कालतक भीतर ही स्तम्भन करने का नाम अन्तः “विधारण” है, बाहर रोकने का नाम “वाहृाकुम्भक” और भीतर रोकने का नाम “अन्त: कुम्भक” प्राणायाम है। मैत्री आदि से योगी का चित्त निर्मल होकर प्रच्छर्दनविधारण तथा पूरणविधारण से स्थिति को प्राप्त होता है।। भाव यह है कि योगी अपने चित्त को रेचक और कुम्भक प्राणायाम से स्थिर करे।। सं० - अब चित्तस्थिति का और उपाय कथन करते हैं:-

सूत्र :विषयवती वा प्रवृत्तिरुत्पन्ना मनसः स्थिति निबन्धिनी ॥॥1/35
सूत्र संख्या :35

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पद० - विषयवती। वा। प्रवृत्ति: उत्पन्ना। मानस:। स्थितिनिबन्धिनी। पदा० - (वां) अथवा (विषयवती) गन्धादि विषयों का (प्रवृत्ति:) साक्षात्कार करने वाली मानसवृत्ति (उत्पन्ना) उत्पन्न होकर (मनस:) मन की (स्थितिनिबन्धिनी) स्थिति को सम्पादन करती है।।

व्याख्या :
भाष्य - जब योगी नासिका के अग्रभाग, जिहृा के अप्रभाग तथा जिहृामूल आदि स्थानों में चित्त का संयम करता है तब उसके चित्त की गंध, रस, रूप आदि को विषय करती हुई साक्षात्काररूपता वृत्ति उत्पन्न होती है इस से भी योगी का चित्त स्थिरता को प्राप्त होता है।। तात्पर्य्य यह है कि एक विषय में होनेवाले धारणा, ध्यान, समाधि इन तीनों का नाम संयम है, इसका निरूपण आगे करेंगे।। प्रकृत यह है कि नासिका के अपभाग में संयम करने से जो योगी को दिव्यगन्ध का साक्षात्कार होता है उसको “गन्धप्रवृत्ति” कहते हैं, एवं जिहृा के अप्रभाग में संयम करने से उत्पन्न हुए दिव्यरस के साक्षत्कार का का नाम “रसप्रवृत्ति” और तालु में संयम करने से उत्पन्न हुए दिव्यरूप के साक्षात्कार का नाम “रूपप्रवृत्ति” है तथा जिहृा के मध्य में संयम करने से उत्पन्न हुए दिव्यषब्द के साक्षात्कार का नाम “शब्दप्रवृत्ति” है, यह पांचो प्रवृत्तियें अल्पकाल में ही उत्पन्न होकर शास्त्र, अनुमान तथा आचार्य्य से जाने हुए अन्य विषयों मे विश्वास उत्पन्न कराती हैं और प्रकृति पुरूष के विवके तथा ईश्वर से शीघ्र ही चित्त को स्थिर करती है, अतएव योगी विषयवती प्रवृत्ति से चित्त की स्थिरता को सम्पादन करे।। सं० - अब चित्तस्थिति का और उपाय कथन करते हैं:-

सूत्र :विशोका वा ज्योतिष्मती ॥॥1/36
सूत्र संख्या :36


व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पद० - विषोका । वा। ज्योतिष्मती । पदा० - (वा) अथवा (विशोका, ज्योतिष्मती) विशोकाज्योतिष्मती नामकः प्रवृत्ति उत्पन्न होकर चित्त को स्थिर करती है।।

व्याख्या :
भाष्य - चित्त तथा अस्मिता में संयम द्वारा उत्पन्न हुई विषोका ज्योतिष्मती प्रवृत्ति से भी योगी का चित्त स्थिर होता है, यहां रजोगुण, तपोगुण से रहित सात्त्विक अहंकार का नाम अस्मिता है।। इस प्रवृत्ति का “विशोका” नाम इसलिये है कि उसके उद्य होने से योगी शोक रहित होजाता है और “ज्योतिष्मती” इसलिये है कि चित्त तथा अस्मितारूप ज्योति को विषय करती है।। तात्पर्य्य यह है कि योगी विषोका ज्योतिष्मती नामक प्रवृत्ति से चित्तं की स्थिरता को सम्पादन करे।। “ज्योतिष्मती” यह प्रवृत्ति का नाम है और विशोका उसका विशेषण है, यहां इतना विशेष जानना चाहिये कि चित्त को विषय करनेवाली प्रवृत्ति का नाम विषयवती विशोका ज्योतिष्मती और चित्त के कारण अस्मिता को विषय करनेवाली प्रवृत्ति का नाम विषोका ज्योतिष्मती है।। सं० - अब और उपाय कहते हैं:-

सूत्र :वीतराग विषयम् वा चित्तम् ॥॥1/37
सूत्र संख्या :37

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पद० - वीतारागविषयं। वा। चित्तम् । पदा० - (वा) अथवा (वीतरागविषयं) रागरहित पुरूषों क चित्त में संयम करने से (चित्तम्) योगी का चित्त स्थिर होता है।।

व्याख्या :
भाष्य - राग, द्वेष, माहादि से रहित सृष्टि की आदि में होनेवाले वेदप्रकाशक अग्रि, वायु आदि महर्षिों को “वीरतराग” कहते हैं, इन महानुभावों के चित्त में लगाया हुआ योगी का चित्त स्थिति को प्राप्त होता है।। भाव यह है कि योगी अपने चित्त की स्थिति के लिये वीराग पुरूषों के चित्त में संयम करे।।

सूत्र :स्वप्ननिद्रा ज्ञानालम्बनम् वा ॥॥1/38
सूत्र संख्या :38

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पद० - स्वप्रनिद्राज्ञानालम्बनं। वा। पदा० - (वा) अथवा (स्वप्रनिद्राज्ञानालम्बनं) स्वप्रज्ञान तथा निद्रांज्ञान के विषय में संयम वाला चित्त स्थिर होता है।।

व्याख्या :
भाष्य - स्वप्रज्ञान के विषय माता, पिता, आचार्य्य आदि और सुषुप्तिज्ञान के विषय ब्रहानन्द में संयम करने से योगी का चित्त स्थिति को प्राप्त होता है।। भाव यह है कि योगी चित्तस्थिति के लिये स्वप्रज्ञान वा निद्राज्ञान के विषय माता, पिता, आचार्य्य तथा परमात्मा के स्वरूपभूत सुख में संयम करे।। सं०- अब चित्तस्थिति का अन्य सुगम उपाय कहते हैं:-

सूत्र :यथाभिमतध्यानाद्वा ॥॥1/39
सूत्र संख्या :39

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पद० - यथाभिमतध्यानात् । वा। पदा० - (वा) अथवा (यथाभिमतध्यानात्) शास्त्रोक्त चित्तस्थिति साधनों के मध्य स्वाभीष्टसाधन में संयम करने से चित्त स्थिर होता है।।

व्याख्या :
भाष्य - नाभिचक, हृदयकमल, मूर्द्धज्योति:, आदि के मध्य जहां रूचि हो वहीं ही संयम करने से चित्त स्थित होता है।। तात्पर्य्य यह है कि शास्त्रों में जिन ध्येय पदार्थों का वर्णन किया है, उनमें से किसी एक में योगी अपनी रूचि के अनुसार संयम करे, उस ध्येय में स्थित हुअस चित्त परमात्मा में भी स्थिति को प्राप्त होता है।। सं० - अब चित्त की छढ़ स्थिति का चिन्ह निरूपण करते हैं:-

सूत्र :परमाणु परममहत्त्वान्तोऽस्य वशीकारः ॥॥1/40
सूत्र संख्या :40

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पद० - परमाणुपरममहत्त्वान्त:। अस्य । वशीकारः । पदा० - (अस्य) इस योगी के चित्त का (परमाणुपरममहत्त्वान्त:) परमाणु से लेकर परममहत् वस्तु पर्य्यन्त (वशीकार:) वशीकार होता है।।

व्याख्या :
भाष्य - पूर्वोक्त चित्तस्थिति के उपायों वाले योगी का चित्त सूक्ष्म वस्तु में संयम करता हुआ परमाणु पथ्र्यन्त निर्विघ्र स्थिति को प्राप्त होता है और स्थूलवस्तु में संयम करत हुआ परममहत् परिणाम वाले आकाशादिकों में निर्विघ्र स्थिति को पाता है। प्रतिबन्ध से रहित चित्तस्थिति का नाम “वशीकार” है, यह वशीकार ही चित्तस्थिति का चिन्ह है, इसी वशीकार से पूर्ण हुअ योगी का चित्त फिरर किसी अन्य उपाय की अपेक्षा नहीं रखता।। भाव यह है कि दृढस्थितिपथ्र्यन्त ही उपायों की आवश्यकता है पश्चात् नहीं।। सं० - अब स्थिर हुए चित्त में होनेवाली सम्प्रज्ञातसमाधि का विषय तथा उसक स्वरूप निरूपण करते हैं:-

सूत्र :क्षीणवृत्तेरभिजातस्येव मणेर्ग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु तत्स्थतदञ्जनता समापत्तिः ॥॥1/41
सूत्र संख्या :41

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पद० - क्षीणवृत्ते: । अभिजातस्य। इव । मणेः । ग्रहीतृग्रहणग्राहृोषु। तत्स्थतद जनता । समापत्तिः। पदा० - (अभिजातस्य) अतिषुद्ध (मणे:) मणि को (इव) भांति (क्षीणवृत्ते:) राजसतामसवृत्तिरहित शुद्धसत्त्वमय चित्त का (गृहीतृग्रहणग्राहृोषु) गृहीता, ग्रहण तथा ग्राहृा में (तत्स्थतदजनता) स्थिर होकर इनके समान आकार को धारण करना (समापत्ति:) सम्प्रज्ञातसमाधि है।।

व्याख्या :
भाष्य - स्थूल, सूक्षम, सर्वपदार्थगोचर ज्ञान के आश्रय परमात्मा का नाम गृहीता तथा ज्ञान का नाम ग्रहण और आनन्द तथा अनन्त कल्याण गुणमय परमात्मा का नाम ग्राहृा है, उनके सम्बन्ध से तदाकारता को प्राप्त हुई योगी के चित्त की वृत्ति का नाम सम्प्रज्ञातसमाधि है।। भाव यह है कि जैसे अत्यन्त स्वच्द स्फटिक मणि रक्तपीतादि पुष्प के सम्बन्ध से अपनी शुक्कता को परित्याग कर उनके रक्तता आदि आकार को प्राप्त होती है वैसेही अभ्यास वैराग्यादि साधनों के अनुष्ठानद्वारा राजस, तामस, निखिल प्रमाणदि वृत्तिरूप मल से रहित हुआ चित्त गृहीतृ आदि के सम्बन्ध से अपने रूप को परित्याग कर उनके समानाकार वृत्ति वाला होजाता हैं, उसी गृहीतृ आदि के समान आकार को प्राप्त हुए चित्त के सात्विकरूप वृत्ति का नाम सम्प्रज्ञातसमाधि है।। यहां इतना विशेष ज्ञातव्य हे कि जो १७ वें सूत्र मे आचार्य ने वितर्क विचार, आनन्द, अस्मिता, इस प्रकार सम्प्रज्ञातसमाधि के चार भेद दिखलाकर इस सूत्र में आनन्द तथा अस्मिता को ग्राहृासमापत्ति क अन्तर्गत मान गृहीतृसमापत्ति ग्रहणसमापत्ति तथा ग्राहृासमापत्ति, यह तीन भेद दिखलाए हैं, इसका भाव यह है कि समाधि का आलम्बन परमात्मा एक है, इस कारण उसके स्वरूप में होनेवाली सम्प्रज्ञातसमाधि भी एक ही प्रकार की है केवल अवान्तरभेद से चार, तीन तथा दो भेद हैं, जैसा कि आनन्दसमापत्ति तथा अस्मितासमापत्ति ग्राहृासमापत्ति से पृथक् नहीं, वैसे ही ग्राहृासमापत्ति भी गृहीतृ समापत्ति से पृथक् नहीं, क्योंकि आनन्द तथा अस्मिता की भांति परमात्मा का गृहीतृस्वरूप भी योगियों का ग्राहृा है और जिस प्रकार अनादिकाल से परमात्मा आनन्दस्वरूप तथा अनन्तकल्याणगुणविषिष्ट है वैसे ही स्थूल, सूक्ष्म सर्व पदार्थों का ज्ञाता भी है, भेद केवल इतना है कि सर्वज्ञातृत्व सापेक्षधर्म और शेष निरपेक्षधर्म है इसी आशय से आचार्य्य ने प्रथम चार और अनन्तर तीन भेद दिखलाकर पश्चात् वितर्क, विचार अर्थात् गृहीतृसमापत्ति और ग्रहणसमापत्तियों को ही अवान्तर भेद से चार प्रकार का निरूपण करके “ताएव सबीज: समाधि:” इस ४६ वे सूत्र में सम्प्रज्ञातसमाधि कथन किया है, इसलिये योगाधिकारियों का प्रथम सम्प्रज्ञातसमाधि के वितर्क, विचार यह दोही भेद मन्तव्य हैं।। सर्व ज्ञातृत्वधर्म को मुख्य मानकर अनन्तकल्याणगुणमय सच्चिदानन्द परमात्मा के स्वरूप में होनेवाली समाधि का नाम वितर्क=गृहीतृसमापत्ति और प्राकृत पदार्थों के सम्बन्ध से निर्मुक्त केवल ज्ञानमय परमात्मा के स्वरूप में होने वाली समाधि का नाम विचार=ग्रहणसमापत्ति है, यह दोनों भी दो २ प्रकार की है अर्थात् सविर्तक और निर्वितर्क भेद से वितर्क दो प्रकार की और सविचार तथा निर्विचार भेद से विचारसमापत्ति दो प्रकार की है, जिनका वर्णन यथाक्रम अग्रिम सूत्रों में विस्तार से किया है।। सं० - अब सवितर्कसमाधि का लक्षण करते हैं:-

सूत्र :तत्र शब्दार्थज्ञानविकल्पैः संकीर्णा सवितर्का समापत्तिः ॥॥1/42
सूत्र संख्या :42

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पद० - तत्र। शब्दार्थज्ञाननविकल्पै:। सडंकीर्णा। सवितर्का । समापत्ति:। पदा० - (तत्र) पूर्वोक्त समाधियों के मध्य में (शब्दार्थज्ञानविकल्पै:) शब्द, अर्थ, ज्ञान इन तीनों के विकल्पों से (सडंकीर्णा) मिली हुई जो (समपत्ति:) सम्प्रज्ञातसमाधि है उसको (सवितर्का) सवितर्क कहते हैं।।

व्याख्या :
भाष्य - श्रोत्र इन्द्रिय से ग्रहण करने योग्य ध्वनि के परिणाम को शब्द कहते हैं अर्थात् जो तालु आदि स्थानों के संयोग से प्रकट होकर श्रोत्र इन्द्रिय से ग्रहण की जाय, ऐसा ध्वनि विशेष का नाम “शब्द” है, गोत्व आदि जाति के आश्रय गो आदि व्यक्ति का नाम “अर्थ” है, उस अर्थ का विषय करने वाली शब्द से उत्पत्र हुई चित्तनिवृत्ति का नाम “ज्ञान” है, इन तीनों की अभेद रूप से प्रतीति का नाम “विकल्प” है, जो समाधि इन तीन भिन्न - भिन्न पदार्थों को अभिन्न रूप से विषय करती है अर्थात् जिस समाधि में शब्द, अर्थ तथा ज्ञान का अभेद रूप से मान होता है उसको सवितर्कसमाधि कहते हैं।। भाव यह है कि जिस समाधि में योगी का परमात्मा के सर्वज्ञातृत्वस्वरूप का अपने वाचक शब्द तथा अपने ज्ञान से क्षीरनीर की भांति मिश्रित का मान होता है उसको सवितर्कसमाधि कहते हैं, और विकल्पित अर्थ को विषय के कारण योगियों की परिभाषा में इसका नाम “अपरप्रत्यक्ष” है, अभ्यास, वैराग्यादि साधनों के अनुष्ठान से यह योगी को प्रथम प्राप्त होता है अर्थात् “परमात्मा संर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् है” इस प्रकार के अनुसंधान करने से जो परमात्मा के स्वरूप में योगी के चित्त की स्थिति होती है उसको सवितर्कसमाधि कहते हैं।। सं० - अब निर्वितर्क समाधि का लक्षण करते हैं:-

सूत्र :स्मृतिपरिशुद्धौ स्वरूपशून्येवार्थमात्रनिर्भासा निर्वितर्का ॥॥1/43
सूत्र संख्या :43

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पद० - स्मृतिपरिशुद्धौ। स्वरूपशून्या। इव । अर्थमात्रनिर्भासा। निर्वितर्का। पदा० - (स्मृतिपरिशुद्धौ) विकल्प के कारण वाच्य वाचक भाव सम्बन्ध के विस्मरण हो जानेपर (स्वरूपशून्ययइव) अपने स्वरूप से शून्यकी भांति (अर्थमात्रनिर्भासा) केवल निर्विकल्प अर्थ के स्वरूप से भान होनेवाली चित्तवृत्ति को (विर्वितर्का) निर्वितर्क समाधि कहते हैं।।

व्याख्या :
भाष्य - शब्द तथा अर्थ के वाच्य वाचक भाव सम्बन्ध को संकेत कहते हैं, जब वह सवितर्कसमाधि के पुनः २ अभ्यास से विस्मरण होता है तब अर्थ के वाचक शब्द तथा शब्द से उत्पन्न होनेवाले ज्ञानकी उपस्थिति नहीं होती, उपस्थिति न होने के कारण उन दोनों के विकल्प से रहित केवल असंकीर्ण अर्थ में होने वाली समाधि का नाम निर्वितर्क है अर्थात् जिस समाधि में अर्थाकार योगीकी चित्तवृत्ति अपने आलम्बन अर्थ से पृथक् प्रतीति के योग्य नहीं रहती और शब्द तथा ज्ञान के विकल्प से शून्य केवल अर्थ ही अर्थ का मान होता है उसको निर्वितर्कसमाधि कहते हैं।। भाव यह है कि जिस समाधि में शब्द तथा ज्ञान के विकल्प से रहित केवल परमात्मा के स्वरूप में स्थित हुई योगी की चित्तवृत्ति परमात्मस्वरूप ही हो जाती है उसको निर्वितर्कसमाधि कहते हैं।। इस समाधि में विकल्प रहित यथार्थ अर्थ का भान होने से योगीजन इसको “परप्रत्यक्ष” कहते हैं। शास्त्रकार इसी समाधि द्वारा यथार्थ रूपसे सम्पूर्ण अर्थो का साक्षात्कार करके पुनः शब्द तथा ज्ञान के विकल्प द्वारा उनका उपदेश तथा प्रतिपादन करते हैं, अतएव प्रथम योगी को सवितर्कसमाधि में भी विकल्पित अर्थ का ही भान होता है, यह समाधि प्रथम की अपेक्षा उत्कृष्ट है।। सं० - वितर्क समाधि के दोनों भेदों का लक्षण करके अब विचारसमाधि के सविचार तथा निर्विचार भेदों का लक्षण करते हैं:-

सूत्र :एतयैव सविचारा निर्विचारा च सूक्ष्मविषय व्याख्याता ॥॥1/44
सूत्र संख्या :44

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पद० -एतया। एव। सविचारा । निर्विचारा। च। सूक्ष्मविषया। व्याख्याता। पदा० - (एतया, एव) इस सवितर्क तथा निर्वितर्कसमाधि के लक्षण से ही (सूक्ष्मविषया) सूक्ष्मविषय में होनेवाली (सविचारा) सविचारसमाधि, तथा (निर्विचारा) निर्विचारसमाधि का भी (व्याख्याता) लक्षण जानना चाहिये।।

व्याख्या :
भाष्य - विषय सहित ज्ञान में देश, काल, विषय तथा विषय का कारण, इन चारों का भान होता है केवल ज्ञान में नहीं, इसलिय सविषयज्ञान की अपेक्षा केवलज्ञान सूक्ष्म है, इसके सम्बन्ध तदाकारता को प्राप्त हुई चित्तवृत्ति का नाम सविचार तथा निर्विचारसमाधि है अर्थात् स्थूल सूक्ष्म सर्वविषयों से निमुक्त ईश्वर के ज्ञानमात्र में स्थिर हुई योगी की चित्तवृत्ति को सविचार तथा निर्विचारसमाधि कहते हैं।। जिस समाधि में ज्ञान के आश्रय परमात्मा का भान नहीं होता किन्तु ज्ञानमात्र का ही भान होता है उसको सविचारासमाधि और जिसमें सम्पूर्ण जगत् की योनि अनन्तकल्याणगुणमय सविदानन्दस्वरूप परमात्मा का भान होता है उसको निर्विचारसमाधि कहते हैं, यहां पर जो सवितर्क, निर्वितर्क, सविचार, निर्विचार, इस प्रकार समाधियों का क्रम से वर्णन किया है उसका भाव यह है कि योगी पूर्व २ समाधि को परित्याग करके उत्तरोत्तर समाधि को अपने सम्पादन करे अर्थात् प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय को सम्पादन करके अपने आपको कृतार्थ न मानले, क्योंकि परमात्मा में समाधि होने से ही पुरूष कृतार्थ होता है, जैसा कि “यच्छेद्वाड्मनसप्रिाज्ञस्तद्यच्छेज्ज्ञानआत्मनि, ज्ञानमात्मनिमहतिनियच्छेत्तद्यच्छेच्छान्तआत्मनि” कठ० ३ । १३ में कहा है कि बुद्धिमान् योगी इन्द्रियों को विषयों से रोककर मनमें लय करे और मन को बुद्धि में तथा बुद्धि को सर्वज्ञाता परमात्मा में लय करे।। सं० - अब सविचार, निर्विचचार समाधि के विषय की सीमा का निरूपण करते हैं:-

सूत्र :सूक्ष्मविषयत्वम्चालिण्ग पर्यवसानम् ॥॥1/45
सूत्र संख्या :45

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पद० - सूक्ष्मविषयत्वं । च । अलिड्डपर्यवसानम्। पदा० - (च) और सूक्ष्म विषय में होनेवाली समाधि का (अलिड्डपर्यवसानम्) ईश्वर पर्य्यन्त (सूक्ष्मविषपत्वं) सूक्ष्मविषय है।।

व्याख्या :
भाष्य - सूक्ष्म विषय में होनेवाली सविचार तथा निर्विचार समाधि के विषय की अवधि परमात्मा है।। और जो आधुनिक टीकाकार “अलिड्ड” पद का अर्थ प्रकृति करके सविचार तथा निर्विचार समाधि का विषय प्रकृति पर्य्यन्त करते हैं यह टीका नहीं, क्योंकि “इन्द्रियेभ्यः पर मनोमनसः सत्त्वमुत्तमम्” कठ ६ । ८ इत्यादि उपनिषदों में स्पष्ट पाया जाता है कि अलिड्ड परमात्मा का नाम है और वह प्रकृति से सूक्ष्म है, उसी के ज्ञान से योगी जन अमृतको प्राप्त होते है, अतएव यहां “अलिड्ड” पद का अर्थ ईश्वर है, प्रकृति नहीं।। सं० - अब सब समाधियों को मिलाकर सम्प्रज्ञातसमाधि का उपसंहार करते हैं:-

सूत्र :ता एव सबीजस्समाधिः ॥॥1/46
सूत्र संख्या :46

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पद० - ताः। एव। सबीजः समाधि: । पदा० - (ताः, एव) पूर्वाक्त चारो समाधियों को ही (सबीज: समाधि:) सम्प्रज्ञात योग कहते हैं।।

व्याख्या :
भाष्य० - सवितर्क, निर्वितर्क, सविचार, निर्विचार, इन चारों समाधियों का नाम सम्प्रज्ञातसमाधि है।। सं० - अब उक्त समाधियों में से निर्विचारसमाधि की उत्तमता कथन करते हैं:-

सूत्र :निर्विचारवैशारद्येऽध्यात्मप्रसादः ॥॥1/47
सूत्र संख्या :47

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पद० - निर्विचारवैशारद्ये। अध्यात्मप्रसाद:। पदा० - (निर्विचारवैशारद्ये) निर्विचार समाधि की निर्मलता से (अध्यात्मप्रसाद:) सब पदार्थों का यथार्थ ज्ञान होता है।।

व्याख्या :
भाष्य - रजोगुण, तमोगुण की निवृत्ति द्वारा निर्मल हुए चित्त की ईश्वर पर्य्यन्त सूक्ष्म विषयों में आवरण रहित निरन्तर एकतान स्थिति का नाम “निर्विचार वैशारद्य” है, ऐसे वैशारद्य के होने से योगी को “अध्यात्मप्रसाद” की प्राप्ति होती है अर्थात् निर्विचारसमाधि की निर्मलता से ईश्वर पर्य्यन्त भूत भौतिकादि सम्पूर्ण पदार्थों का यथार्थरूप से साक्षात्कार होता है, इसी अध्यात्मप्रसाद का दूसरा नाम प्रज्ञालोक तथा प्रज्ञाप्रसाद भी है इसी अभिप्राय से भाष्यकार ने कहा है कि:- प्रज्ञाप्रसादमारूहृाशोच्य: शोचतोजनान्। भूतिष्टानिवशैलस्थ: सर्वान्प्राज्ञोऽनुपश्यति।। अर्थ - जैसे पर्वत पर स्थित हुआ पुरूष नीचे के सब पदार्थों को देखता है वैसे ही शोक से रहित योगी प्रज्ञाप्रसाद को प्राप्त होकर सब पदार्थों को देखता है, यही अध्यात्मप्रसाद प्रकृति पुरूष के विवेक का परम उपाय है, इसी को प्राप्त हुआ योगी अपने आत्मा को साक्षात्कार करता है, अर्थात् जब योगी को निर्विचार समाधि का निर्मलता प्राप्त होती है जब उसको प्रकृति तथा प्रकृति के कार्य्य महत्त्व आदि से भिन्न अपने आत्मा का साक्षात्कार होता है जिसको सत्त्वपुरूषान्यताख्याति कहते हैं, इसको प्राप्त होकर फिर योगी जन्ममरणरूप दुःख का अनुभव नहीं करता, अतएव यह समाधि सब समाधियों से उत्कृष्ट तथा उपादेय है।। सं० - अब योगियों का परिभाषानुसार अध्यात्मप्रसाद की संज्ञा कथन करते हैं:-

सूत्र :ऋतंभरा तत्र प्रज्ञा ॥॥1/48
सूत्र संख्या :48

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पद० - ऋतंभरा। तत्र। प्रज्ञा । पदा० - (तत्र) उस निर्विचारसमाधि की निर्मलता होने पर एकाग्रचित्त योगी को जो (प्रज्ञा) जानकी प्राप्ति होती है योगीजन उसको (ऋतंभरा) ऋतंभरा प्रज्ञा कहते हैं।।

व्याख्या :
भाष्य - ऋत नाम विकल्प से रहित यथार्थ अर्थ को विषय करने के अध्यात्मप्रसाद की अन्वर्थ संज्ञाका नाम “ऋतंभरा” है।। सं० - अब अनुमान ज्ञान तथा शब्दज्ञान से उक्त प्रज्ञा की उत्कृष्टता निरूपण करते हैं:-

सूत्र :श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषया विशेषार्थत्वात् ॥॥1/49
सूत्र संख्या :49

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पद०- श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यां। मन्यविषया। विशेषार्थत्वात्। पदा० - (श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यां) शब्दज्ञान तथा अनुमान ज्ञान से (अन्यविषया) समाधिप्रज्ञा का विषय भिन्न है क्योंकि वह (विशषार्थत्वात्) यथार्थ अर्थ को विषय करती है।

व्याख्या :
भाष्य - अनुमान से जो ज्ञात होता है उसको अनुमानप्रज्ञा और शब्द से जो ज्ञात होता है उसका शब्दप्रज्ञा कहते हैं, यह दोनों प्रज्ञा सामान्य रूप से अर्थ को विषय करती है अर्थात् इनसे विषय का साक्षात्कार नहीं होता किन्तु ‘कोई वस्तु है’ इस प्रकार परोक्ष रूप से वस्तु का मान होता है, परन्तु समाधि प्रज्ञा से स्थूल सूक्ष्म सब पदार्थों का हस्तामलकवत् भान होता है इसलिये, यह प्रज्ञा अनुमान आदि प्रज्ञाओं से विलक्षण है, जिस योगी को यह प्राप्त होता है वह सर्वज्ञ हो जाता है। सं० - अब उक्त प्राजन्य संस्कारों को व्युत्थान संस्कारों की प्रतिबन्धकता कथन करते हैं:-

सूत्र :तज्जस्संस्कारोऽन्यसंस्कार प्रतिबन्धी ॥॥1/50
सूत्र संख्या :50

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पद० - तज्जः। संस्कार । अन्यसंस्कारप्रतिबन्धी। पदा० - (तज्जः) समाधिप्रज्ञा से उत्पन्न हुआ (संस्कार:) संस्कार (अन्यसंस्कारप्रतिबन्धी) व्युत्थान संस्कारों का प्रतिबन्धक होता है।।

व्याख्या :
भाष्य - प्रमाणदि वृत्तियों के जनक संस्कारों को व्युत्थानसंत्कार कहते हैं, यद्यपि वह अनादि तथा अनन्त हैं तथापि तत्त्वास्पर्शी अर्थात् सविकल्पज्ञानजन्य होने से प्रबल नहीं और प्रज्ञासंस्कार तत्त्वास्पर्शी अर्थात् निर्विकल्पज्ञानजन्य होने से प्रबल है, इसलिये प्रज्ञासंस्कार से उनका प्रतिबन्ध हो जाता है जिससे वह प्रमाण आदि वृत्तियों के उत्पन्न करने में असमर्थ हो जाते है और उनके असमर्थ हो जाने से समाधिप्रज्ञा तथा उसके संस्कार चकवत् पुनः २ आवत्र्तमान हुए नितान्त दृढ़ हो जाते हैं उनके दृढ़ होने से अविद्या आदि क्केश शुभाशुभ कर्म और उनकी वासनाएं सर्वथा निवृत्त हो जाती है, पश्चात् भोग से विरक्त हुआ चित्त पुनः संस्कार की उत्पत्ति के लिये चेष्टा नहीं करता क्योंकि समाधिप्रज्ञा ही चित्तचेष्टा की अन्तिम सीमा है।।

सूत्र :तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीजः समाधिः ॥॥1/51
सूत्र संख्या :51

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द

अर्थ : पद०- तस्य । अपि। निरोघे। सर्वपिराधात्। निर्वीजः। समाधिः। पदा० - (तस्य, अपि) परवैराग्यद्वारा प्रज्ञा तथा प्रज्ञासंस्कारों का (निरोघे) निरोघ होजाने पर (सर्घनिरोघात्.) पुरातन नूतन सर्वसंस्कारों के न रहने से (विर्वीजः, समाधि:) निर्वीजसमाधि होती है।।

व्याख्या :
भाष्य - प्रज्ञा तथा प्रज्ञासंस्कारों की पुन: २ आवृत्ति से जो चित्त को तृप्ति होती है उसको परवैराग्य कहते हैं, उस परवैराग्य से प्रज्ञा तथा उसके संस्कारों की सर्वथा निवृत्ति होजाती है उनके निवृत्त होने से कतकरज=निर्मली की भांति परवैराग्य तथा उसक संस्कार भी निवृत्त होजाते हैं, उन सब के निवृत्त होने से निरालम्बन हुआ चित्त असम्प्रज्ञातसमाधि को प्राप्त होता है, इस समाधि में संसार के बीत अविद्या आदि क्केश, शुभाशुभ कर्म और उनकी वासनाओं की निवृत्ति होजाती है इसलिये इसको निर्वीजसमाधि भी कहते हैं यह सब समाधियों से उत्तम समाधि है जैसाकिः- आगमेनानुपानेनध्यानाभयासरसेन च। त्रिधा प्रकल्पयन्प्रज्ञां लभते योगमुत्तमम्।। इस व्यासभाष्य में कथन किया है कि वेदविहित श्रवण और श्रवण हुए अर्थ का पश्चात् युक्तियों से चिन्तनरूप मनन तथा निदिध्यासन से उत्तम योग अर्थात् असम्प्रज्ञातसमाधि की प्राप्ति होती है।। ध्येय पदार्थ में विजातीय ज्ञानों से रहित जो सजातीय ज्ञानों का प्रवाह उसको निदिध्यासन कहते हैं।। भाय यह है कि श्रवण, मनन, निदिध्यासन, से योगी समाघिप्रज्ञा अर्थात् ऋतंभराप्रज्ञा को प्राप्त होता है और इससे परवैराग्य तथा परवैराग्य से उत्तम योग अर्थात् असम्प्रज्ञातसमाधि को प्राप्त होता है, इसीको निर्विकल्पसमाधि कहते हैं, यही समाधि सम्पूर्ण कत्र्तव्यों की अवधि है, इसलिये मुमुक्षुजनों को उपादेय है, इस समाधि में निरूद्ध हुआ चित्त निरोधसंस्कारों के सहित अपनी प्रकृति में लन होजाता है, चित्त के लीन होने से स्वरूप में स्थित हुआ पुरूष अपने स्वरूप से ही परमात्मा को साक्षात्कार करता है अर्थात् परमात्मा के स्वरूपभूत आनन्द को भोगता है, इसी अवस्था को प्राप्त होने वाले योगी को ब्रहाभूत अर्थात मुक्त कहते हैं।। इसी भाव को मुण्डकोपनिषद् में इस प्रकार स्पष्ट किया है कि:- यदापश्य: पश्यतेरूक्मवर्ण कर्तारमीशं पुरूषं ब्रहृायोनिम्। तदा विद्वाना पुण्यपापे विधूय निरज्जनः परमं साम्यमुपैति।। मु० २। २। ३। अर्थ - जब विवकी पुरूष वेदप्रकाशिका, स्वयंप्रकाश, जगत्कत्र्ता परमात्मा को देखता है तब अज्ञान से रहित होकर पुण्यपान की निवृत्तिद्वारा मोक्ष को प्राप्त होता है।। दोहा - योगारम्भ प्रतिज्ञा, लक्षण साधन ज्ञान। द्विविघयोग का कथन कर, किया पाद अवसान।। इति श्रीमदार्य्यमुनिनोपनिवद्धे, योगार्य्यभाष्ये प्रथमः समाधिपादः समाप्त:।।













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