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Patanjali Yoga Sutras YOGA DARSHAN

विविध भारतीय दर्शनों के बीच योग दर्शन का स्थान अत्यन्त महत्वपूर्ण है।  योग का स्वरूप अत्यन्त व्यापक है परन्तु इसकी मौलिक अवधारणा दार्शनिक एवं आध्यात्मिक है। ऐतिहासिक दृष्टि से योग विज्ञान का विकास कई खण्डों में हुआ है, जो प्राचीन उपनिषदों, श्रीमद्भगवद्गीता तथा पातंजलि योगसूत्रों में निहित योग के आधारभूत ज्ञान से लेकर तदनन्तर कालीन हिन्दू, जैन, बौद्ध, सूफी तथा सिक्ख आदि धर्मों के दार्षनिक विचारों के माध्यम से विविध रूप में विकसित होता हुआ योग का ज्ञान आधुनिक काल में स्वामी विवेकानंद, श्री अरविंद, महात्मा गांधी आदि विचारकों के प्रयास के स्वरूप में दिखाई देता है। वस्तुतः योग भारतीय दर्शन का सार है। यह एक सुविदित तथ्य है कि भारतीय दर्शन का चरम लक्ष्य प्राणियों को त्रिविध दुःखों से सदा के लिये छुटकारा दिलाना ही है। दुःखों की यह आत्यंतिक निवृत्ति, मुक्ति, मोक्ष, कैवल्य, अपवर्ग, निःश्रेयस्, निर्वाण और परमपद इत्यादि पदों से अभिहित की गई है। इसकी सिद्धि के लिये प्रायः हम सभी भारतीय दर्शन (चार्वाक और मीमांसा के अतिरिक्त) पदार्थों के शुद्ध ज्ञान को किसी न किसी प्रकार से अपरिहार्य उपाय मानते ह...