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#Meditation #ध्यान

Meditation  ध्यान












What is meditation

Meditation isn’t about becoming a different person, a new person, or even a better person. It’s about training in awareness and getting a healthy sense of perspective. You’re not trying to turn off your thoughts or feelings. You’re learning to observe them without judgment. And eventually, you may start to better understand them as well.






ध्यान क्या है?

ध्यान एक अलग व्यक्ति, एक नया व्यक्ति या एक बेहतर व्यक्ति बनने के बारे में नहीं है। यह जागरूकता के बारे में प्रशिक्षण और परिप्रेक्ष्य की एक स्वस्थ भावना प्राप्त करने के बारे में है। आप अपने विचारों या भावनाओं को बंद करने की कोशिश नहीं कर रहे हैं। आप बिना निर्णय के उनका पालन करना सीख रहे हैं। और अंत में, आप उन्हें भी बेहतर समझने लग सकते हैं।
GYANVIYOGA    ज्ञानवीयोग





GYANVIYOGA    ज्ञानवीयोग

नाड़ियां
गोरक्ष संहिता के अनुसार नाभि के नीचे नाड़ियों का मूल स्थान है, उसमें से 72 हजार नाड़ियां निकली हैं, उनमें प्रमुख 72 हैं। उनमें से तीन प्रमुख नाड़ियां हैं- इड़ा, पिंगला तथा सुषुम्ना।

इड़ा नाड़ी बायीं नासिका तथा पिंगला नाड़ी दायीं नासिका से संबद्ध है।  इड़ा नाड़ी मूलाधार के बाएं भाग से निकलकर प्रत्येक चक्र को पार करते हुए मेरुदंड में सर्पिल गति से ऊपर चढ़ती है और आज्ञा चक्र के बाएं भाग में इसका अंत होता है। पिंगला नाड़ी मूलाधार के दाएं भाग से निकलकर इड़ा की विपरीत दिशा में सर्पिल गति से ऊपर चढ़ती हुई आज्ञा चक्र के दाएं भाग में समाप्त होती है। इड़ा निष्क्रिय, अंतर्मुखी एवं नारी जातीय तथा चन्द्र नाड़ी का प्रतीक है। पिंगला को सूर्य नाड़ी भी कहते हैं। इन दोनों के बीच में सुषुम्ना नाड़ी है, जो मेरुदंड के केंद्र में स्थित आध्यात्मिक मार्ग है। इसका आरंभ मूलाधार चक्र तथा अंत सहस्रार में होता है। इसी सुषुम्ना नाड़ी के आरंभ बिंदु पर इसका मार्ग अवरुद्ध किए हुए कुंडलिनी शक्ति सोयी पड़ी है। इस शक्ति के जग जाने पर शक्ति सुषुम्ना, जिसे ब्रह्मरंध्र भी कहते हैं, में प्रवेश कर सभी चक्रों को भेदती हुई सहस्रार चक्र पर शिव से मिल जाती है।

जब बायीं नासिका में श्वास का प्रवाह अधिक होता है, तो इड़ा नाड़ी, जो हमारी मानसिक शक्ति का प्रतीक है, की प्रधानता रहती है। इसके विपरीत  जब दायीं नासिका में श्वास का अधिक प्रवाह होता है, तो यह शारीरिक शक्ति का परिचायक है तथा यह शरीर में ताप, बहिर्मुखता को दर्शाता है। जब दोनों नासिकाओं में प्रवाह समान हो, तो सुषुम्ना का प्राधान्य रहता है। इड़ा एवं पिंगला में संतुलन लाने के लिए शरीर को पहले षटकर्म, आसन, प्राणायाम, बंध तथा मुद्रा द्वारा शुद्ध करना होता है। जब इड़ा एवं पिंगला नाड़ियां शुद्ध तथा संतुलित हो जाती हैं, तथा मन नियंत्रण में आ जाता है, सुषुम्ना नाड़ी प्रवाहित होने लगती है। योग में सफलता के लिए सुषुम्ना का प्रवाहित होना आवश्यक है। यदि पिंगला प्रवाहित हो रही है, तो शरीर अशांत तथा अति सक्रियता बनी रहेगी, यदि इड़ा प्रवाहित हो रही है, तो मन अति क्रियाशील और बेचैन रहता है। जब सुषुम्ना प्रवाहित होती है, तब कुंडलिनी जाग्रत होकर चक्रों को भेदती हुई ऊपर की ओर 
चढ़ती है।

प्राण
प्राण का अर्थ है जीवनी शक्ति। मनीषियों ने इस जीवनी शक्ति को स्थूल रूप में श्वास से संबद्ध माना है। श्वास के माध्यम से ही मनुष्य के शरीर में प्राण तथा जीवन का संचार होता है। मानव शरीर में 5 प्रकार की वायु या प्राण हैं-अपान, समान, प्राण, उदान और व्यान। अपान गुदा प्रदेश में स्थित है, समान नाभि प्रदेश में स्थित है, प्राण की स्थिति हृदय क्षेत्र में, उदान गले के क्षेत्र में स्थित है और व्यान पूरे शरीर में व्याप्त है।

हठयोग ग्रंथों में प्राणायाम के अभ्यास की चर्चा की गई है। इनके अभ्यास से प्राण यानी ऊर्जा शक्ति पर नियंत्रण या नियमन संभव हो जाता है। प्राण वायु को अपान वायु में तथा अपान को प्राणवायु में हवन करने से भी कुंडलिनी शक्ति जागृत होकर सुषुम्ना के अंदर प्रवेश करती है और चक्रों का भेदन करती हुई सहस्रार चक्र में स्थित कराने में सहायक सिद्ध होती है।  कुंडलिनी जागृत करने हेतु मुख्य प्राणायाम हैं-सूर्यभेदी, उज्जायी, शीतली, भस्त्रिका, भ्रामरी, मूर्च्छ, प्लाविनी, नाड़ीशोधन आदि।


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